9 मार्च 2018

शक्तिपात की विधि

कल सत्संग  में गुरुदेव से  निखिल ने  पूछा " आपने आप को अधिक भाग्यशाली और जागरूक बनाने के लिए मैं और क्या करूँ ?"

"तुम अपना काम करो मैं अपना काम कर ही रहा हूँ "

मैने पूछा " मुझे यहाँ आने के पहले के वर्षों में अत्यंत उत्सुकता रहती थी पर अब नहीं है ?"

"पहले तुम्हारे पास बहुत से प्रश्न थे अब अहोभाव है "

इसी बीच गुरुदेव शक्तिपात के बारे में बताने लगे
" जब अंदर की शक्ति का विकास होता है तो पहले नेत्र से फिर मस्तिष्क से और अंत में अंगुलियों के पोरों से ऊर्जा निकलती है।  जब भी तुम्हे किसी को दीक्षा देनी हो तो शक्ति को अपने मूलाधार से आज्ञा चक्र पर ले आना।  साधक के इड़ा पिंगला को स्पर्श करके उसको मूलाधार की तरफ मोड़ देना। फिर मस्तिष्क के दोनों हिस्सों में ऊर्जा की हलचल को महसूस करके उसको  को सहस्त्रसार के तरफ दिशा देना।  अंत में गले की माला को अपने ओर खींचना।  फिर  अपने अंगूठे को  साधक के  आज्ञा चक्र में रख कर थोड़ा दबाव बनाकर  अपनी शक्ति को  उस पर प्रसारित करना। और तीन बार ॐ नमः शिवाय का मन में जाप करना। "


"  तुमको इस प्रक्रिया में साधक की एनर्जी के स्तर और उसकी विषमता का अनुभव होगा।  इस प्रक्रिया से उसकी ऊर्जा में समरूपता और गति आएगी। तुम्हारी ऊर्जा से उसकी नाड़ियाँ गति वान होकर उर्ध्व गामी होंगी।"

अंत में गुरुदेव ने कहा " तुमसे बन जायेगा। इसका प्रयास करते रहना। "



1 टिप्पणी:

  1. bahut achchha kiya aapne jo ise record kar liya, bahut jaruri hai ki mastishk ke alawa bhi writing me bate likhi jaye, hamari smriti simit jo hoti hai, hardik aabhar

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