1 मार्च 2018

महान लेखक जान पॉल सात्रे ने 1964 में नोबेल पुरूस्कार लेने से इंकार कर दिया

  महान लेखक जान पॉल सात्रे  ने 1964 में नोबेल पुरूस्कार लेने से इंकार कर दिया। उन्होने इस अवसर पर जो पत्र लिखा है वह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की तरह इतिहास में दर्ज है।








 मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस है कि इस मुद्दे को सनसनीखेज़ घटना की तरह देखा जा रहा है: एक पुरस्कार मुझे दिया गया था और इसे मैंने लेने से इंकार कर दिया।

यह  सब इसलिए हुआ कि मुझे इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं था कि भीतर ही भीतर क्या चल रहा है। 15 अक्टूबर, ‘फ़िगारो लिट्रेरिया’ के स्वीडिश संवाददाता स्तम्भ में मैंने जब पढ़ा कि स्वीडिश अकादमी का रुझान मेरी तरफ है, लेकिन फिर भी ऐसा कुछ निश्चित नहीं हुआ है, तो मुझे लगा कि अकादमी को इस बाबत ख़त लिखना चाहिए जिसे मैंने अगले दिन ही लिखकर रवाना कर दिया ताकि इस मसले की मालूमात कर लूं और भविष्य में इस पर कोई चर्चा न हो।

तब मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि ‘नोबेल पुरस्कार’ प्राप्तकर्ता की सहमति के बगैर ही प्रदान किया जाता है। मुझे लग रहा था कि वक्त बहुत कम है और इसे रोका जाना चाहिए, लेकिन अब मैं जान गया हूं कि स्वीडिश अकादमी के किसी फ़ैसले को बाद में मंसूख करना संभव नहीं।

जैसा कि मैं अकादमी को लिखे पत्र में ज़ाहिर कर चुका हूं, मेरे इंकार करने का स्वीडिश अकादमी या नोबेल पुरस्कार के किसी प्रसंग से कोई लेना-देना नहीं है। दो वजहों का ज़िक्र मैंने वहां किया है: एक तो व्यक्तिगत और दूसरे मेरे अपने वस्तुनिष्ठ उद्देश्य।

मेरा प्रतिषेध आवेशजनित नहीं है। निजीतौर पर मैंने आधिकारिक सम्मानों को हमेशा नामंजूर ही किया है। 1945 में युद्ध के बाद मुझे लिजन ऑफ़ ऑनर (Legion of Honor) मिला था। मैंने लेने से इंकार कर दिया, यद्यपि मेरी सहानुभूति सरकार के साथ थी। इसी तरह अपने दोस्तों के सुझाव के बावज़ूद भी ‘कॉलेज द फ़्रांस’ में घुसने की मेरी कभी चेष्टा नहीं रही।

इस नज़रिए के पीछे लेखक के जोख़िम भरे उद्यम के प्रति मेरी अपनी अवधारणा है। एक लेखक जिन भी राजनैतिक, सामाजिक या साहित्यिक जगहों पर मोर्चा लेता है,  वहां वह अपने नितांत मौलिक साधन- यानी ‘लिखित शब्दों’ के साथ ही मौज़ूद होता है। वे सारे सम्मान जिनकी वजह से उसके पाठक अपने ऊपर दबाब महसूस करने लगें, आपत्तिजनक हैं। बतौर ज्यां-पाल सार्त्र के दस्तख़त या नोबेल पुरस्कार विजेता ज्यां-पाल सार्त्र के दस्तखतों में भारी अंतर है।

एक लेखक जो ऐसे सम्मानों को स्वीकार करता है, वस्तुतः खुद को एक संघ या संस्था मात्र में तब्दील कर देता है। वेनेजुएला के क्रांतिकारियों के प्रति मेरी संवेदनाएं एक तरह से मेरी अपनी प्रतिबद्धताएं हैं, पर यदि मैं नोबेल पुरस्कार विजेता, ज्यां-पाल सार्त्र की हैसियत से वेनेजुएला के प्रतिरोध को देखता हूं तो एक तरह से ये प्रतिबद्धताएं नोबेल पुरस्कार के रूप में एक पूरी संस्था की होंगी। एक लेखक को इस तरह के रूपांतरण का विरोध करना चाहिए, चाहें वह बहुत सम्मानजनक स्थितियों में ही क्यों न घटित हो रहा हो, जैसा कि आजकल हो रहा है।

यह नितांत मेरा अपना तौर-तरीका है और इसमें अन्य विजेताओं के प्रति किसी भी तरह का निंदा भाव नहीं। यह मेरा सौभाग्य है कि ऐसे कई सम्मानित लोगों से मेरा परिचय है और मैं उन्हें आदर तथा प्रशंसा की दृष्टि से देखता हूं।

कुछ कारणों का संबंध सीधे मेरे उद्देश्यों से जुड़ा है: जैसे, सांस्कृतिक मोर्चे पर केवल एक-ही तरह की लड़ाई आज संभव है- दो संस्कृतियों के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की लड़ाई। एक तरफ पूर्व है और दूसरी तरफ पश्चिम। मेरे कहने का यह अभिप्राय भी नहीं कि ये दोनों एक-दूसरे को गले से लगा लें- मैं भलीभांति इस सच को जानता हूं कि ये दोनों संस्कृतियां आमने-सामने खड़ीं हैं और अनिवार्य रूप से इनका स्वरूप द्वंद्वात्मक है- पर यह झगड़ा व्यक्तियों और संस्कृतियों के बीच है और संस्थाओं का इसमें कोई दखल नहीं।

दो संस्कृतियों के इस विरोधाभास ने मुझे भी गहरे तक प्रभावित किया है। मैं ऐसे ही विरोधाभासों की निर्मिती हूं। इसमें कोई शक नहीं कि मेरी सारी सहानुभूतियां समाजवाद के साथ हैं और इसे हम पूर्वी-ब्लॉक के नाम से भी जानते हैं; पर मेरा जन्म और मेरी परवरिश बूर्जुआ परिवार और संस्कृति के बीच हुई है। ये सब स्थितियां मुझे इस बात की इज़ाज़त देती हैं कि मैं इन दोनों संस्कृतियों को करीब लाने की कोशिश कर सकूं।  ताहम, मैं उम्मीद करता हूं कि “जो सर्वश्रेष्ठ होगा,वही जीतेगा.” और वह है –समाजवाद।

इसलिए मैं ऐसे सम्मान को स्वीकार नहीं कर सकता जो सांस्कृतिक प्राधिकारी वर्ग के ज़रिये मुझे मिल रहा हो। चाहें वह पश्चिम के बदले पूर्व की ओर से ही क्यों न दिया गया हो, चाहें मेरी संवेदनाएं दोनों के अस्तित्व के लिए ही क्यों न पुर-फ़िक्र हों, जबकि मेरी सारी सहानुभूति समाजवाद के साथ है, यदि कोई मुझे ‘लेनिन पुरस्कार’ भी देता तब भी मेरी यही राय रहती और मैं इंकार करता...जबकि दोनों बातें एकदम अलहदा हैं।

मैं इस बात से भी वाकिफ़ हूं कि नोबेल पुरस्कार पश्चिमी खेमे का साहित्यिक पुरस्कार नहीं है, पर मैं यह जानता हूं कि इसे कौन महत्त्वपूर्ण बना रहा है, और कौनसी वारदातें जो कि स्वीडिश अकादमी के कार्यक्षेत्र के बाहर है, इसे लेकर घट रही हैं –इसलिए सामयिक हालातों में यह सुनिश्चित हो जाता है कि नोबेल पुरस्कार पूर्व और पश्चिम के बीच फांक पैदा करने के लिए या तो पश्चिम के लेखकों की थाती हो गया है, या फिर पूरब के विद्रोहियों के लिए आरक्षित है। यथा,ये कभी नेरुदा को नहीं दिया गया जो दक्षिण अमेरिका के महान कवियों में से हैं। कोई इस पर गंभीरता से नहीं सोचेगा कि इसे लुइ अरागोन को क्यों नहीं दिया जाना चाहिए जबकि वह इसके हकदार हैं। यह अफ़सोसजनक था कि शोलकोव की जगह पास्टरनक को सम्मानित किया गया था, जो अकेले ऐसे रूसी लेखक थे, जिनका विदेशों में प्रकाशित काम सम्मानित हुआ जबकि अपने ही वतन में यह प्रतिबंधित किया गया था।

दूसरी तरह से भी संतुलन स्थापित हो सकता था। अल्जीरिया के मुक्ति संग्राम में जब हम सब“121 घोषणापत्र”पर दस्तखत कर रहे थे, तब यदि यह सम्मान मुझे मिलता तो मैं इसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार कर लेता क्योंकि यह केवल मेरे प्रति सम्मान न होता बल्कि उस पूरे मुक्ति-संग्राम के प्रति आदर-भाव होता जो उन दिनों लड़ा जा रहा था। लेकिन चीज़ें इस दिशा में,इस तरह नहीं हुईं।
अपने उद्देश्यों पर चर्चा करते वक्त स्वीडिश अकादमी को कम-अज-कम उस शब्द का ज़िक्र तो करना चाहिए था –जिसे हम ‘आज़ादी’ कहते हैं और जिसके कई तर्जुमें हैं. पश्चिम में इसका अर्थ सामान्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सन्दर्भों तक सीमित है- अर्थात् एक ऐसी ठोस आज़ादी, जिसमें आपको एक जोड़ी जूते से अधिक पहनने और दूसरे के हिस्से की भूख हड़प लेने का अधिकार है। अतः मुझे लगा कि सम्मान से इंकार करना कम खतरनाक है, बजाय इसे स्वीकार करने के। यदि मैं इसे स्वीकार कर लेता तो यह खुद को “उद्देश्यों के पुनर्वास” हेतु सौंपना होता।

‘फ़िगारो लिट्रेरिया’में प्रकाशित लेख के अनुसार, “किसी भी तरह के विवादास्पद राजनैतिक अतीत से मेरा नाम नहीं जुड़ा था।” लेख का मंतव्य अकादमी का मंतव्य नहीं था और मैं जानता था कि दक्षिणपंथियों में मेरी स्वीकारोक्ति को क्या जामा पहनाया जाता। मैं “विवादित राजनैतिक अतीत” को आज भी जायज़ ठहराता हूं। मैं इस बात के लिए भी तैयार हूं कि यदि अतीत में मेरे कॉमरेड दोस्तों से कोई गलती हुई हो तो बेहिचक मैं उसे कुबूल कर सकूं।

इसका यह अर्थ भी न लगाया जाए कि ‘नोबेल पुरस्कार’ बूर्जुआ मानसिकता से प्रेरित है, लेकिन निश्चित रूप से ऐसे कई गुटों में, जिनकी नस-नस से मैं वाकिफ़ हूँ, इसकी कई बूर्जुआ व्याख्याएं जरूर की जायेंगी।

अंत में, मैं उस देय निधि के प्रश्न पर बात करूंगा। पुरस्कृत व्यक्ति के लिए यह भारस्वरूप है। अकादमी समादर-सत्कार के साथ भारी राशि अपने विजेताओं को देती है। यह एक समस्या है जो मुझे सालती है। अब या तो कोई इस राशि को स्वीकार करे और इस निधि को अपनी संस्थाओं और आंदोलनों पर लगाने को अधिक हितकारी समझे –जैसा कि मैं लन्दन में बनी रंग-भेद कमिटी को लेकर सोचता हूं; या फिर कोई अपने उदार सिद्धांतों की खातिर इस राशि को लेने से इंकार कर दे, जो ऐसे वंचितों के समर्थन में काम आती, लेकिन मुझे यह झूठ-मूठ की समस्या लगती है। ज़ाहिर है मैं 250,000 क्राउंस की क़ुरबानी दे सकता हूं क्योंकि मैं खुद को एक संस्था में रूपांतरित नहीं कर सकता –चाहे वह पूर्व हो या पश्चिम। पर किसी को यह कहने का हक़ भी नहीं है कि 250,000 क्राउंस मैं यूं ही कुर्बान कर दूं जो केवल मेरे अपने नहीं हैं, बल्कि मेरे सभी कॉमरेड दोस्तों और मेरी विचारधारा से भी तालुक्क रखते हैं।

इसलिए ये दोनों बातें- पुरस्कार लेना या इससे इंकार करना, मेरे लिए तकलीफ़देह है।

इस पैगाम के साथ मैं यह बात यहीं समाप्त करता हूं कि स्वीडिश जनता के साथ मेरी पूर्ण सहानुभूति है और मैं उनसे इत्तेफ़ाक रखता हूं।

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