13 मई 2017

' जहाँ प्रेम नहीं है वहां भी प्रेम देने से तुमको प्रेम की मिलता है '

बुद्धम शरणम् गच्छामि।।
संघम शरणम् गच्छामि।। 
धम्मं शरणम् गच्छामि।।






मनुष्य के जीवन में आजीविका परिवार और सामान्य दैनिक क्रिया के अलावा एक आत्मिक प्यास मौजूद रहती है। एक क्रिस्चियन साधिका डोरोथी डे ने अपने जीवन के संस्मरण की किताब   'दी लॉन्ग लोनलीनेस ' लिखी है। 
उसने लिखा है की जीवन के एकांत का उपाय धर्म रूपी सामाजिक जीवन है। संघम शरणम् का अर्थ यही है। 


एक प्रख्यात जर्मन प्रोटेस्टेंट संत और विचारक ने कहा है की धार्मिक जीवन के लिए सबसे बड़ी जरुरत होती है त्याग और तपस्या की। 



 बुद्ध के साथ के लोगों ने जीवन और धर्म के बहुत से प्रयोग किये है और उसके आधार पर उन्होने बहुमूल्य सूत्र दिए है। बुद्धम शरणम् के अर्थ है जीवंत सद्गुरु की शरण। संघम शरणम् का मतलब है धार्मिक संघ के साथ जीवन जीना। अकेले व्यक्ति को धर्म का आचरण कठिन होता है इसलिए सामुदायिक जीवन में लोगों के साथ रहने से आचरण की शुद्धता आती है। 


धम्म शरणम् का अर्थ है की जीवन ,गुरु निर्देश ,संघ जीवन में भी सिद्धांतों और मानकों को जीवन में धारण करने के लिए धर्म के सिद्धांत के प्रति शरणागत होना पड़ता है। 

सेंट जॉन ने कहा है  ' जहाँ प्रेम नहीं है वहां भी प्रेम देने से तुमको  प्रेम की मिलता है '