3 मई 2017

आध्यात्मिक मार्ग में हमें किसी के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है

हमारे दैनिक जीवन में जब किसी समस्या को अथवा कष्ट को सुलझाने में हम असमर्थ होते हैं, तब उस स्थिति में हमें किसी के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
उदाहरणार्थ,
  • जब हम अस्वस्थ होते हैं तब हम अच्छे डॉक्टर अथवा चिकित्सकीय क्षेत्र में अनुभवी व्यक्ति से सलाह लेते हैं और उसके अनुसार ही सब करते हैं ।
  • जब हमारी कार (वाहन)खराब हो जाती है, तब हम किसी मैकेनिक की सलाह के अनुसार उस वाहन का ध्यान रखते हैं ।
  • जब कोई न्याय का विषय हमारे सामने होता है, तब हम किसी वकील का परामर्श लेते हैं और उसके परामर्श का सतर्कता से पालन करते हैं ।
ये कुछ उदाहरण हैं जहां हम दूसरोंका परामर्श लेते हैं । तब हम यह स्वीकार करते हैं कि हम उस क्षेत्र में निपुण नहीं हैं और उनकी सहायता के लिए हम उन्हें बडी राशि देने के लिए भी सिद्ध होते हैं ।
परंतु जब हमारे जीवन के मूल उद्देश्य- अध्यात्म और आध्यात्मिक प्रगति (प्रारब्ध भोग भोगने से परे),का विषय आता है, तब हम यही सोचते हैं किहम यह भली भांति जानते हैं कि स्वयं के लिए क्या उचित है । हमारी साधना में प्रमुख अडचन यह है कि हम इस विषय में खुले मन से सुनते नहीं और इस विषय में किसी का परामर्श भी नहीं लेते । इस कारण हमारी आध्यात्मिक प्रगति की हानि होती है ।
साधना के विषय में मार्गदर्शन लेने में मन का संघर्ष किस कारण से होता है ?
इसके कुछ कारण इस प्रकार हैं:
  • हम यह सोचते हैं कि अध्यात्म बहुत ही व्यक्तिगत विषय है और दूसरे हमें इस विषय में मार्गदर्शन नहीं कर पाएंगे ।
  • किसका सुनना है, यह हम निश्चित रूप से समझ नहीं पाते ।
  • हम समझते हैं कि हम स्वयं ही भली-भांति जानते हैं कि हमारे लिए क्या उचित है ?
इन अडचनों पर विजय पाने के लिए और सुनने की कला विकसित करने के लिए इन सूत्रों को ध्यान में रख सकते हैं ।
  • जैसे किसी अन्य क्षेत्र में हमें जानकार व्यक्ति की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार से आध्यात्मिक यात्रा में भी हमें मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, अन्यथा किसी अनुचित आध्यात्मिक मार्ग पर चलकर हम अपना पूरा जीवन व्यर्थ गंवा सकते हैं । इसके कारण साधना में  अटक सकते हैंअथवा हमारी साधना की हानि हो सकती है ।
  • यदि किसकी सुनें ? इस विषय में हमें संभ्रम हो तो अध्यात्म के मूलभूत सिद्धांत इनका पालन करने से हमारी साधना योग्य दिशा में तब तक बढती रहती है जब तक कि हमारे जीवन में मार्गदर्शक न आ जाए ।
  • अध्यात्म बहुत ही व्यक्तिगत स्वरूप का होता है और मोक्षप्राप्ति के लिए स्वयं को ही व्यक्तिगत मार्ग ढूंढना पडता है । लेकिन हमें अध्यात्म के सिद्धांतों को व्यक्तिगत समझकर और उन तत्त्वों की मर्यादा में रहकर ही साधना के विषय में निर्णय लेने पडते हैं ।इसलिए हमें उन लोगों का सुनना चाहिए जिन्होंने में अध्यात्म के  सिद्धांतों का पालन कर साधना  किया हो ।
  • यदि हमारी आध्यात्मिक प्रगति करने की लगन तीव्र हो, प्रामाणिक और निष्पक्ष हो, तो स्वयं से ही हमारे जीवन में योग्य व्यक्ति आते हैं जो हमें आध्यात्मिक प्रगति में सहायता कर सकें, चाहे हम विश्व के किसी भी कोने में क्यों न हों । एक पुरानी कहावत के अनुसार, गुरु को ढूंढना नहीं चाहिए, शिष्य सिद्ध हो जाने पर गुरु स्वयं से ही प्रकट हो जाते हैं ।

ईश्वर से वार्ता उनके ईश्वर साथ सत्संग की भांति है

गुरु ,उन्नत साधक और संतों के साथ सतसंग 





साधना न करनेवाला व्यक्ति दुख में ईश्वर का स्मरण करता है तथा उनसे बातें करता है । आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर व्यक्ति न केवल कठिन समय में अपितु अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को ईश्वर के साथ बिताता है । वह ईश्वर को अपनी प्रत्येक त्रुटि एवं आंतरिक विचार बताता है । ऐसे साधक को कुछ कालावधि के पश्‍चात ऐसा अनुभव होता है कि उसे अंतरमन से उत्तर प्राप्त होने लगे हैं । जैसे-जैसे उसकी साधना बढती है, वह निरंतर ईश्वर के सान्निध्य में रहने का प्रयास करता है । ईश्वर से वार्ता उनके (ईश्वर)साथ सत्संग की भांति है और यह सत्संग सर्वोच्च स्तर का होता है ।



तीव्र आध्यात्मिक प्रगति हेतु, हमें निरंतर उन्नत साधकों अथवा अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शक के सत्संग में रहना चाहिए । सत्संग से प्राप्त लाभ के अतिरिक्त, यह हमें दोष निवारण का अवसर प्रदान करता है, साधना में सुधार होता है तथा साधना में आनेवाली अडचनों के निर्मूलन हेतु मार्गदर्शन प्राप्त होता है ।

सत्संग का पूर्व नियोजन करने से उन्नत साधकों के साथ व्यतीत किए जानेवाले समय का समुचित उपयोग विशेष लक्ष्य प्राप्ति हेतु होता है । उदाहरणार्थ, किसी उन्नत साधक से मिलने के पूर्व दिन और समय संबंधी योजना बनानी चाहिए । इसके लिए हमें अपनी अनुभूतियों, बाधाओं, प्रश्‍न एवं साधना में हो रही प्रगति संबंधी सूत्र इत्यादि लिखकर रखने चाहिए ।

उन्नत साधकों के साथ वार्तालाप करते हुए अथवा उनके सान्निध्य में रहकर जो सूत्र एवं अंतरनिहित सिद्धांत हम सीखते हैं, वे भी हमें लिखना चाहिए । साथ ही उन्हें आचरण में उतारने का प्रयास करना चाहिए । कोई विशेष घटना अथवा बातचीत किसी सिद्धांत को समझाने में सहायक होती है, उसमें निहित सिद्धांतों को समझने पर हमारा विशेष ध्यान होना चाहिए । 
उदाहरणार्थ, यदि उन्नत साधक दूरभाष को स्वच्छ कर योग्य तरीके से रखने का उदाहरण देते हैं, तो हमें उस उदाहरण में निहित स्वच्छता और परिपूर्णता के सिद्धांत का अभ्यास साधना का एक भाग समझकर करना चाहिए । हमें यह भी समझना होगा कि यह सिद्धांत केवल दूरभाष तक सीमित न रहकर सभी स्थानों पर लागू हो । हम जो कुछ भी सीखते हैं अथवा हमें जो मार्गदर्शन प्राप्त होता है उसे आचरण में लाने का प्रयास करने का नियोजन करना चाहिए क्योंकि अभ्यास विहीन ज्ञान व्यर्थ है ।
उन्नत साधक के सत्संग में रहने पर हमें प्रत्येक समय अपने अनुभव को लिखना चाहिए । उदाहरणार्थ, क्या नामजप की मात्रा अथवा गुणवत्ता बढी है, बिना विवेचना के ही किसी शंका का समाधान हुआ, शारीरिक व्याधि, जैसे पीठ की वेदना बिना उपचार के न्यून अथवा बंद हुई, वार्ता के पश्‍चात व्यक्तिगत अनुभव कैसे रहे – अच्छे, बुरे अथवा अपरिवर्तित, क्योंकि साथना का उद्देश्य है आनंद की प्राप्ति , सत्संग से आनंद की अनुभूति में वृद्धि होनी चाहिए । यदि ऐसा नहीं हो रहा हो, तो हमें विश्‍लेषण करना चाहिए कि हमसे क्या चूक हो रही है तथा इसकी पुनरावृत्ति ना हो इस पर ध्यान देना होगा । इसके विपरीत, यदि अच्छी अनुभूति हुई हो, तो क्या सही किया उसका विवेचन करें और भविष्य में उसी पर ध्यान केंद्रित करें ।

साभार : स्पिरिचुअल साइंस रिसर्च फाउंडेशन 

जैसे अग्नि को प्रज्वलित रखने के लिए वायु आवश्यक है उसी प्रकार से साधना को आगे बढाने के लिए सत्संग अनिवार्य है

एक साधक की आध्यात्मिक यात्रा में ‘सत्संग’, साधना का एक महत्त्वपूर्ण अंग है । विशेषकर आध्यात्मिक यात्रा के आरंभ में जबतक अध्यात्म हमारे जीवन का अविभाज्य अंग न बन जाए। 
एक अनुभवी साधक के लिए ‘सत्संग’ ईश्वर, गुरु  एवं सहसाधकों की सेवा करने का एक सुअवसर है । इसमें साधक अपने गुरु के सानिध्य में चर्चा करते है अपने साधना संबंधी अनुभव बांटते हैं तथा अपनी और अन्यों की साधना को प्रोत्साहित करते हैं ।

"सतसंग में भाग लेने से मुझे आतंरिक शक्ति मिली। मैने साधना करनी शुरू की। मेरा पारिवारिक और भौतिक जीवन में स्थिरता आई " सूरज 

जब साधक अध्यात्म शास्त्र का अध्ययन करता है, तब उसे जीवन के विषय में नई धारणाएं ज्ञात होती हैं तथा शिक्षा मिलती है । संभव है कि इन नवीन धारणाओं के कारण उसके मन में कुछ प्रश्‍न उभरें, जैसे – — ‘साधना के सिद्धांत को प्रत्यक्ष अपने जीवन में कैसे उतारूं ? साधना में जो बाधा आ रही है, उसका निवारण कैसे करूं ?’ ऐसे प्रश्‍न अध्यात्म शास्त्र के विद्यार्थी के लिए स्वाभाविक हैं । इन शंकाओं का उचित समय पर समाधान होना महत्त्वपूर्ण है जिससे साधना अबाधित रहे ।
किसी साधक में अध्यात्म प्रसार की लगन, अन्यों के प्रति प्रेम तथा भाव होता है । जब ऐसा साधक सत्संग का संचालन करता है, तब वह ईश्‍वर के विचारों को उत्तम ढंग से ग्रहण कर, अध्यात्म और साधना के विषय में समग्र उत्तर दे पाता है । सत्संग में उपस्थित साधकों का समूह सार्वजनिक रूप से  गुरु के माध्यम से सीख पाता है कि अध्यात्म संबंधी ऐसे प्रश्‍न उभरने पर क्या दृष्टिकोण अपनाना उपयुक्त है ।

प्रश्‍न अनुत्तरित रहें, तो प्रयास थम जाते हैं । कुछ साधकों के विषय में तो उनकी साधना की रेल पटरी से ही उतर जाती है । सत्संग में आने वाले कुछ साधकों को सुखद आश्‍चर्य होता है जब उन्हें सत्संग में अपने मन के अनुत्तरित प्रश्‍नों के उत्तर अनायास ही, बिना पूछे मिल जाते हैं । जब कोई साधक सत्संग में आनेका प्रयास करता हे तो ईश्‍वर उस साधक के मनमें कुछ समय से अनुत्तरित रहे प्रश्‍नों का समाधान कर उसकी सहायता करते हैं ।

आज के युग में भौतकता पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाता है और अध्यात्म पर अल्प । ऐसे में वातावरण में आध्यात्मिक अशुद्धता बढने लगती है । इसे आध्यात्मिक प्रदूषण कहते हैं और इसका अर्थ होता है कि रज और तम, इन सूक्ष्म घटकों की वातावरण में वृद्धि होना । इस आध्यात्मिक प्रदूषण के कारण हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा क्षीण होने लगती है और सप्ताह के अंत में ऐसा लगता है मानो हमारी आध्यात्मिक बैटरी समाप्त (खाली) हो हुई है । इसके कारण हम शक्तिहीन अनुभव करते है और साधना के विषय में सोचना भी कठिन हो जाता है । इससे साधना को आगे बढाने का उत्साह कम हो सकता है ।

जब हम सत्संग में उपस्थित रहते हैं, तब सत्संग की उच्च आध्यात्मिक सकारात्मकता का हम पर प्रभाव पडता है । वातावरण दैवी चैतन्य से भर जाता है । इसमें प्रमुख सूक्ष्म घटक सत्व होता है । जब सत्संग गुरु साक्षात् उपस्थित हों  और साथ  में उच्च आध्यात्मिक स्तर के साधक उपस्थित होते हों , जिनमें भाव और सीखने की वृत्ति भी है, तो सत्संग की आध्यात्मिक सकारात्मकता और बढ जाती है । कभी कभी अच्छी शक्तियां और देवता भी सूक्ष्म रूप से सत्संग में उपस्थित रहकर साधकों पर कृपा करते हैं ।

चुनौती भरे दिनचर्या  के उपरांत साधकों की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति क्षीण हो जाती है । लेकिन सत्संग में उपलब्ध दैवी चैतन्य और सात्विकता (आध्यात्मिक पवित्रता) के कारण, साधक आध्यात्मिक सकारात्मकता से प्रभावित होते हैं तथा उन्हें साधना के प्रयासों में सातत्य बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रेरणा और उत्साह प्राप्त होते हैं ।

आलाव (कैम्पफायर) के घेरे में बैठे लोगों को अग्नि की उष्णता अनुभव होती है । उसी प्रकार सत्संग में उपस्थित सभी साधकों की साधना को अन्य साधकों की आध्यात्मिक अनुभूतियों से पोषण मिलता है । जैसे अग्नि को प्रज्वलित रखने के लिए वायु आवश्यक है उसी प्रकार से साधना को आगे बढाने के लिए सत्संग अनिवार्य है ।




 सत्संग के पोषक आध्यात्मिक वातावरण के कारण ही  समग्र उत्थान संभव होता है ।

साभार : स्पिरिचुअल साइंस रिसर्च फाउंडेशन