26 अप्रैल 2017

''जैनरिक / ब्रांडेड दवाएं - कुछ तथ्य " (डॉ मोहन नागर के विचार )

''जैनरिक / ब्रांडेड दवाएं - कुछ तथ्य " (डॉ मोहन नागर के विचार )
ब्रांडेड कंपनियों की दवाओं की कीमत ज्यादा क्यों होती हैं ?
१ - उन्हें रिसर्च से लेकर लाइसेंस / क्वालिटी कंट्रोल / निवेश तक बहुत सारा खर्च लगता है और पेटेंट के लिए भी ताकि उनकी कोई नकल न कर पाए ।
२ - जेनरिक दवाएं क्या हैं - पेटेंट खत्म होने के बाद कोई भी देशी कंपनी तक उस फार्मूले की दवा बना सकती है जिसके लिए उन्हें दुबारा रिसर्च / परीक्षण वगैरह की जरूरत नहीं पड़ती इसलिए वही मंहगी दवा क्वालिटी में बराबर होते भी निर्माण में सस्ती ।
३ - मरीजों को क्या घाटा और कहाँ कहाँ -
A - पेटेंट खत्म होने के बाद ब्रांडेड कंपनियों को दवाओं का मूल्य कम करना चाहिए क्योंकि पेटेंट अवधि तक उनका खर्च वसूल हो चुका होता है पर न वो करती हैं न सरकारों का नियंत्रण!
B - जेनरिक दवाएं बनाने वाली कंपनियाँ सस्ती लागत और R & D पेटेंट वगैरह के खर्च से छूट के बावजूद जेनरिक दवाइयों पर M. R. P. ब्रांडेड कंपनियों जितनी ही छापती हैं .. मेडिकल स्टोर वाला मरीजों को छपे मूल्य पर ही दवा देता है .. यानि पूरा का पूरा फायदा मेडिकल स्टोर वाले का Wholeseller से लेकर Retailers तक .. सात रुपये में पड़ने वाले जेनरिक के केल्सियम को सत्तर में बेचने से ज्यादा मुनाफा है मेडिकल वाले का तो वो कुछ भी नाम लिखे डाक्टर .. दस में से आठ को ज्यादा मुनाफे वाली जेनरिक ही थमाता है जिसके बारे में डाक्टर तक को नहीं पता होता क्योंकि हर मरीज दवा चैक नहीं करवाते।
C - जेनरिक के ही बीच नकली और घटिया दवाओं की बड़ी आसानी से खपत हो जाती है जिनके लेबल नकली .. पेकेजिंग शानदार पर मेडिकल स्टोर वाले को जेनरिक से भी ज्यादा मार्जिन लिहाज़ा आसान खपत वो भी पूरे दाम पर .. मरीजों का तिहरा घाटा ।
४ - क्या होना चाहिए -
A -पेटेंट की अवधि खत्म हो चुकी दवाइयों की कीमतों को सरकार तुरंत नियंत्रण में लेकर कम करे ये सरकार का अधिकार है इसके लिए किसी नियम की जरूरत नहीं ये तत्काल हो सकता है !
B - जेनरिक दवाओं पर M. R. P. तत्काल प्रभाव से नियंत्रित करे सरकार .. Wholeseller नौ प्रतिशत मार्जिन के साथ Retailer को कोई केल्सियम का पत्ता सात रुपये में बेच रहा है तो कंपनी को शायद चार रुपये का पत्ता पड़ता होगा या तीन का .. रिटेलर का मुनाफा भी तय कीजिए .. दस क्या बीस प्रतिशत भी जोड़ें तो जेनरिक क्या ब्रांडेड कंपनी के कुल्शियम का पत्ता नौ रुपये का पड़ना चाहिए या बहुत ज्यादा से ज्यादा दस का .. सत्तर का तो बिल्कुल नहीं .. ये सारा मुनाफा मेडिकल स्टोर वाले का है .. इसमें डाक्टर कहाँ बीच में आते हैं? और कितने। ये भी सोचिए .. क्योंकि इस देश में म
केवल दस प्रतिशत मरीजों को डिग्री धारी डाक्टर नसीब हैं .. नब्बे प्रतिशत मरीज झोलाछाप के पुर्चे से लेकर सीधे मेडिकल स्टोर वाले से दवा खरीद कर खा लेते हैं बड़ी फीस बचाने .. जरा सोचिए ..
जेनरिक से लेकर ब्रांडेड दवाएं तक सस्ती मिलनी चाहिए आपको हकीकत ये है .. सरकार तुरंत कर सकती है पर बड़ी कंपनियों की दवाओं की M. R. P. कम न करवाकर जेनरिक का सुग्गा उड़ाया जा रहा है जिससे जनता का कोई फायदा नहीं .. क्योंकि दाम तो ब्रांडेड कंपनी जितने ही .. जनता का क्या फायदा ? कंपनियों को पहुंचाया जा रहा है ये तो ?