2 मई 2017

जब शिष्य तैयार हो जाता है तब अस्तित्व उसके समक्ष सद्गुरू को प्रकट कर देता है

भारतीय गृहस्थों में यह सामान्य व्यवहार है कि अपने कष्टों और परेशानियों को लेकर के गुरू के पास जाते हैं. गुरू अपनी शक्तियों से उनके कष्टों को दूर करते है . वो उनको ईष्ट की पूजा आराधना करने के लिये कहते हैं . उनको सांत्वना देते है . शुभ कर्म और प्रारब्ध के बारे में बताते हैं

सही गुरू अपने शिष्यों के कष्ट दूर करने का प्रयास तो करते हैं पर वो अच्छे से जानते है कि व्यक्ति प्रारब्ध से आबद्ध है . कष्टों को वो जीवन के कर्मफल का ही स्वरूप मानते है . ईष्ट के प्रति संपूर्ण समर्पण से उत्पन्न भक्ति ही उनका शिष्यों के प्रति अंतिम लक्ष्य रहता है

चमत्कार की आशा में आने वाले भक्तों को ज़्यादातर निराशा ही हाथ लगती है . दरअसल गुरू चमत्कार करके कष्ट हरण का माध्यम नहीं बल्कि जीवन मृत्यु के घोर कष्ट से तारने वाले आध्यात्मिक परंपरा के वाहक है
पाखण्डी गुरूओं की भरमार होने के बावजूद भारत में सद्गुरूओं की कमी नहीं है .

हमारे गुरू और दादागुरू और सभी संतों का कहना है कि जब शिष्य तैयार हो जाता है तब अस्तित्व उसके समक्ष सद्गुरू को प्रकट कर देता है .

मेरा स्वानुभव भी यही है


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