2 मई 2017

भक्ति प्रेम का ही उच्चतम स्वरूप है

प्रेम की महिमा सभी जगह है . दुनिया में सभी वय के लोग बच्चे युवा वृद्ध सभी प्रेम के आकांक्षी है


बच्चों को माता पिता और संसार का प्रेम चाहिये . यह वात्सल्य के रूप में प्रकट होता है .
वृद्धों को यह आदर सम्मान के रूप में चाहिये . युवाओं को श्रिंगार के रूप में यह चाहिये .

गाँवों में भ्रमण करिये तो सभी जगह प्रेम के गीत लाउडस्पीकरों में बजते है .शहरों में युवा तो प्रेम के पीछे पागलपन की हद तक डूबे हुये लगते हैं

मेरे  गुरू अपने  साधना काल में अपने आराध्य भगवान श्री को अपना चिरंतन प्रेमी ही मानते थे . उन्होंने प्रेमिकाओं के जैसे पत्र उनको  लिखें हैं . यहाँ तक कि वृदांवन की गोपियों जैसे उन्होंने अपने प्रेमी गुरू को उलाहना तक दी कि तुमको मुझसे मिलने अमेरिका छोड़ कर भारत आना पड़ेगा . उत्तर में उनके गुरू ने लिखा कि तुम्हारा प्रेम मेरे अंतकरण
को स्पर्श करता है
प्रेम की सर्वकालिकता के बारे में मैंने अपने गुरू से पूछा .
"प्रेम तो जीवन के लिये ज़रूरी है पर यह आध्यात्मिक जीवन के लिये और भी आवश्यक है . पार्थिव प्रेम तो असफल होना ही है . वहाँ प्रेम की चरम सीमा पाई नहीं जा सकती . प्रेमी से एकात्म होना भक्ति में ही संभव है . भक्ति प्रेम का ही उच्चतम स्वरूप है . " गुरूदेव ने कहा 






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