3 मई 2017

जैसे अग्नि को प्रज्वलित रखने के लिए वायु आवश्यक है उसी प्रकार से साधना को आगे बढाने के लिए सत्संग अनिवार्य है

एक साधक की आध्यात्मिक यात्रा में ‘सत्संग’, साधना का एक महत्त्वपूर्ण अंग है । विशेषकर आध्यात्मिक यात्रा के आरंभ में जबतक अध्यात्म हमारे जीवन का अविभाज्य अंग न बन जाए। 
एक अनुभवी साधक के लिए ‘सत्संग’ ईश्वर, गुरु  एवं सहसाधकों की सेवा करने का एक सुअवसर है । इसमें साधक अपने गुरु के सानिध्य में चर्चा करते है अपने साधना संबंधी अनुभव बांटते हैं तथा अपनी और अन्यों की साधना को प्रोत्साहित करते हैं ।

"सतसंग में भाग लेने से मुझे आतंरिक शक्ति मिली। मैने साधना करनी शुरू की। मेरा पारिवारिक और भौतिक जीवन में स्थिरता आई " सूरज 

जब साधक अध्यात्म शास्त्र का अध्ययन करता है, तब उसे जीवन के विषय में नई धारणाएं ज्ञात होती हैं तथा शिक्षा मिलती है । संभव है कि इन नवीन धारणाओं के कारण उसके मन में कुछ प्रश्‍न उभरें, जैसे – — ‘साधना के सिद्धांत को प्रत्यक्ष अपने जीवन में कैसे उतारूं ? साधना में जो बाधा आ रही है, उसका निवारण कैसे करूं ?’ ऐसे प्रश्‍न अध्यात्म शास्त्र के विद्यार्थी के लिए स्वाभाविक हैं । इन शंकाओं का उचित समय पर समाधान होना महत्त्वपूर्ण है जिससे साधना अबाधित रहे ।
किसी साधक में अध्यात्म प्रसार की लगन, अन्यों के प्रति प्रेम तथा भाव होता है । जब ऐसा साधक सत्संग का संचालन करता है, तब वह ईश्‍वर के विचारों को उत्तम ढंग से ग्रहण कर, अध्यात्म और साधना के विषय में समग्र उत्तर दे पाता है । सत्संग में उपस्थित साधकों का समूह सार्वजनिक रूप से  गुरु के माध्यम से सीख पाता है कि अध्यात्म संबंधी ऐसे प्रश्‍न उभरने पर क्या दृष्टिकोण अपनाना उपयुक्त है ।

प्रश्‍न अनुत्तरित रहें, तो प्रयास थम जाते हैं । कुछ साधकों के विषय में तो उनकी साधना की रेल पटरी से ही उतर जाती है । सत्संग में आने वाले कुछ साधकों को सुखद आश्‍चर्य होता है जब उन्हें सत्संग में अपने मन के अनुत्तरित प्रश्‍नों के उत्तर अनायास ही, बिना पूछे मिल जाते हैं । जब कोई साधक सत्संग में आनेका प्रयास करता हे तो ईश्‍वर उस साधक के मनमें कुछ समय से अनुत्तरित रहे प्रश्‍नों का समाधान कर उसकी सहायता करते हैं ।

आज के युग में भौतकता पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाता है और अध्यात्म पर अल्प । ऐसे में वातावरण में आध्यात्मिक अशुद्धता बढने लगती है । इसे आध्यात्मिक प्रदूषण कहते हैं और इसका अर्थ होता है कि रज और तम, इन सूक्ष्म घटकों की वातावरण में वृद्धि होना । इस आध्यात्मिक प्रदूषण के कारण हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा क्षीण होने लगती है और सप्ताह के अंत में ऐसा लगता है मानो हमारी आध्यात्मिक बैटरी समाप्त (खाली) हो हुई है । इसके कारण हम शक्तिहीन अनुभव करते है और साधना के विषय में सोचना भी कठिन हो जाता है । इससे साधना को आगे बढाने का उत्साह कम हो सकता है ।

जब हम सत्संग में उपस्थित रहते हैं, तब सत्संग की उच्च आध्यात्मिक सकारात्मकता का हम पर प्रभाव पडता है । वातावरण दैवी चैतन्य से भर जाता है । इसमें प्रमुख सूक्ष्म घटक सत्व होता है । जब सत्संग गुरु साक्षात् उपस्थित हों  और साथ  में उच्च आध्यात्मिक स्तर के साधक उपस्थित होते हों , जिनमें भाव और सीखने की वृत्ति भी है, तो सत्संग की आध्यात्मिक सकारात्मकता और बढ जाती है । कभी कभी अच्छी शक्तियां और देवता भी सूक्ष्म रूप से सत्संग में उपस्थित रहकर साधकों पर कृपा करते हैं ।

चुनौती भरे दिनचर्या  के उपरांत साधकों की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति क्षीण हो जाती है । लेकिन सत्संग में उपलब्ध दैवी चैतन्य और सात्विकता (आध्यात्मिक पवित्रता) के कारण, साधक आध्यात्मिक सकारात्मकता से प्रभावित होते हैं तथा उन्हें साधना के प्रयासों में सातत्य बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रेरणा और उत्साह प्राप्त होते हैं ।

आलाव (कैम्पफायर) के घेरे में बैठे लोगों को अग्नि की उष्णता अनुभव होती है । उसी प्रकार सत्संग में उपस्थित सभी साधकों की साधना को अन्य साधकों की आध्यात्मिक अनुभूतियों से पोषण मिलता है । जैसे अग्नि को प्रज्वलित रखने के लिए वायु आवश्यक है उसी प्रकार से साधना को आगे बढाने के लिए सत्संग अनिवार्य है ।




 सत्संग के पोषक आध्यात्मिक वातावरण के कारण ही  समग्र उत्थान संभव होता है ।

साभार : स्पिरिचुअल साइंस रिसर्च फाउंडेशन 

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