16 अप्रैल 2017

चरैवेति चरैवेति

कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः

उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् चरैवेति चरैवेति॥

इस मंत्र के ऋषि ने बताया है कि - जो मनुष्य (मोहनिद्रा में ) सोया रहता है और यथार्थ मनुष्य बन जाने के लिए पुरुषार्थ नहीं करता उस मनुष्य का भाग्य भी सोया रहता है,  जो पुरुषार्थ करने के लिये खड़ा हो जाता है, उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है. जो आगे चलना शुरू कर देता है , उसका भाग्य भी आगे आगे चलने लगता है, इसीलिये- " हे मनुष्यों- चरैवेति चरैवेति ! "आगे बढो ,आगे बढ़ते रहो !" 

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