29 अप्रैल 2017

हनुमान जी ने मुझे गंभीर चोट से बचा लिया

श्रीमती उपाध्याय को चोट लगने की ख़बर मिली थी . आज उनके घर में जाकर कुशल क्षेम पूछा . परिवार के सभी सदस्यों से भी मुलाक़ात हुई . गरियाबंद क्षेत्र में बीस साल सेवा देने के बाद उनकी पोस्टिंग रायपुर के पास हुई है

 "अचानक गढ्डा देख कर बाइक को ब्रेक लगाना पड़ा . बाईक अनियंत्रित हो कर पलट गई और मैं ज़ोर से गिर पड़ी . मुझे कमर , सिर , आर बाजु में मामुली चोट आई . "

"डाक्टर को दिखा कर दवा ली और अब सात दिनों के बाद मैं बढ़िया हूँ . मैंने तो तीन दिन में ही काम में जाना शुरू कर दिया था "

"मेरा जहाँ एक्सिटेंड हुआ वही पर ही हनुमान जी का मंदिर था . गिरने के बाद मैंने तुरंत प्रणाम किया . हनुमान जी ने मुझे गंभीर चोट से बचा लिया "


बातचीत में श्रीमती उपाध्याय ने बहुत सी बातें बताई .

28 अप्रैल 2017

गुरूवार सत्संग

गुरूवार सत्संग


आज जैसे ही मैं स्वामी जी के कमरे में पहुँचा तो पाया की सूरज स्वामी जी की सेवा जतन में लगा हुआ है .स्वामी जी बीमारी और उम्र के कारण अशक्त हो गये है .ज़्यादातर मौक़ों में वे बिलकुल नहीं बोलते .शिष्यों से वह ज़रूर बातें करेंगे यह सोचकर मैंने प्रणाम करके बातें शुरू की .एनर्जी की बात चल निकली .हम सभी के जीवन की कई बातों का उल्लेख हुआ .

"पाज़ीटिव  और नेगेटिव दो ही चीजें रहती है। जहाँ दुख ,कलह ,विषाद ,नैराश्य बहुत जादा दिखाई दे समझ जाना की नेगेटिव एनर्जी है।" स्वामी जी ने कहा .

" पॉजिटिव एनर्जी बढ़ाने के क्या उपाय हैगप्पु ने पूछा.

"मैंने तुम लोगों को शुरुवात में सत्संग के लिए प्रेरित किया। यह स्वयं में बहुत महत्वपूर्ण ध्यान विधि है। उसके बाद तुम लोगों को धीरे धीरे मंत्र जाप और पूजा के लिए बताया।इसके बाद  हवन के लिये प्रेरित किया . यह पॉज़िटिव एनर्जी को बढ़ाने की  बहुत शक्तिशाली विधी है "गुरूदेव ने कहा .
"हमारी एनर्जी के लेवल की क्या स्थिति है "सूरज ने पूछा .
"तुम लोगों की स्थिति बहुत अच्छी हो गई है विशेषकर हवन शुरू करने के बाद " स्वामी जी ने कहा .
कुछ देर में अंतरंगता और पारलौकिकता का संदर्भ आया तो स्वामी जी ने कहा " मेरा बहुत आसानी से भगवान श्री से संपर्क हो जाता है , इतने बीमार होने के बावजूद तुम लोगों के यंत्री की  पूजा मैं बिना नागा किये करता हूँ . मैं सूक्ष्म रूप से तुम्हारे हवन में उपस्थित होता हूँ . "


मैंने भाव के बारे में पूछा 
"भावदशा का बहुत महत्व है . इसे नकारना  मत . ये बहुत महत्वपूर्ण है " गुरूदेव ने कहा 


आज गुरूदेव से और भी बहुत सी बातें हुई . इसके बाद हम लोग उपर कक्ष में मंत्र जाप पूजा के लिये चले गये





26 अप्रैल 2017

''जैनरिक / ब्रांडेड दवाएं - कुछ तथ्य " (डॉ मोहन नागर के विचार )

''जैनरिक / ब्रांडेड दवाएं - कुछ तथ्य " (डॉ मोहन नागर के विचार )
ब्रांडेड कंपनियों की दवाओं की कीमत ज्यादा क्यों होती हैं ?
१ - उन्हें रिसर्च से लेकर लाइसेंस / क्वालिटी कंट्रोल / निवेश तक बहुत सारा खर्च लगता है और पेटेंट के लिए भी ताकि उनकी कोई नकल न कर पाए ।
२ - जेनरिक दवाएं क्या हैं - पेटेंट खत्म होने के बाद कोई भी देशी कंपनी तक उस फार्मूले की दवा बना सकती है जिसके लिए उन्हें दुबारा रिसर्च / परीक्षण वगैरह की जरूरत नहीं पड़ती इसलिए वही मंहगी दवा क्वालिटी में बराबर होते भी निर्माण में सस्ती ।
३ - मरीजों को क्या घाटा और कहाँ कहाँ -
A - पेटेंट खत्म होने के बाद ब्रांडेड कंपनियों को दवाओं का मूल्य कम करना चाहिए क्योंकि पेटेंट अवधि तक उनका खर्च वसूल हो चुका होता है पर न वो करती हैं न सरकारों का नियंत्रण!
B - जेनरिक दवाएं बनाने वाली कंपनियाँ सस्ती लागत और R & D पेटेंट वगैरह के खर्च से छूट के बावजूद जेनरिक दवाइयों पर M. R. P. ब्रांडेड कंपनियों जितनी ही छापती हैं .. मेडिकल स्टोर वाला मरीजों को छपे मूल्य पर ही दवा देता है .. यानि पूरा का पूरा फायदा मेडिकल स्टोर वाले का Wholeseller से लेकर Retailers तक .. सात रुपये में पड़ने वाले जेनरिक के केल्सियम को सत्तर में बेचने से ज्यादा मुनाफा है मेडिकल वाले का तो वो कुछ भी नाम लिखे डाक्टर .. दस में से आठ को ज्यादा मुनाफे वाली जेनरिक ही थमाता है जिसके बारे में डाक्टर तक को नहीं पता होता क्योंकि हर मरीज दवा चैक नहीं करवाते।
C - जेनरिक के ही बीच नकली और घटिया दवाओं की बड़ी आसानी से खपत हो जाती है जिनके लेबल नकली .. पेकेजिंग शानदार पर मेडिकल स्टोर वाले को जेनरिक से भी ज्यादा मार्जिन लिहाज़ा आसान खपत वो भी पूरे दाम पर .. मरीजों का तिहरा घाटा ।
४ - क्या होना चाहिए -
A -पेटेंट की अवधि खत्म हो चुकी दवाइयों की कीमतों को सरकार तुरंत नियंत्रण में लेकर कम करे ये सरकार का अधिकार है इसके लिए किसी नियम की जरूरत नहीं ये तत्काल हो सकता है !
B - जेनरिक दवाओं पर M. R. P. तत्काल प्रभाव से नियंत्रित करे सरकार .. Wholeseller नौ प्रतिशत मार्जिन के साथ Retailer को कोई केल्सियम का पत्ता सात रुपये में बेच रहा है तो कंपनी को शायद चार रुपये का पत्ता पड़ता होगा या तीन का .. रिटेलर का मुनाफा भी तय कीजिए .. दस क्या बीस प्रतिशत भी जोड़ें तो जेनरिक क्या ब्रांडेड कंपनी के कुल्शियम का पत्ता नौ रुपये का पड़ना चाहिए या बहुत ज्यादा से ज्यादा दस का .. सत्तर का तो बिल्कुल नहीं .. ये सारा मुनाफा मेडिकल स्टोर वाले का है .. इसमें डाक्टर कहाँ बीच में आते हैं? और कितने। ये भी सोचिए .. क्योंकि इस देश में म
केवल दस प्रतिशत मरीजों को डिग्री धारी डाक्टर नसीब हैं .. नब्बे प्रतिशत मरीज झोलाछाप के पुर्चे से लेकर सीधे मेडिकल स्टोर वाले से दवा खरीद कर खा लेते हैं बड़ी फीस बचाने .. जरा सोचिए ..
जेनरिक से लेकर ब्रांडेड दवाएं तक सस्ती मिलनी चाहिए आपको हकीकत ये है .. सरकार तुरंत कर सकती है पर बड़ी कंपनियों की दवाओं की M. R. P. कम न करवाकर जेनरिक का सुग्गा उड़ाया जा रहा है जिससे जनता का कोई फायदा नहीं .. क्योंकि दाम तो ब्रांडेड कंपनी जितने ही .. जनता का क्या फायदा ? कंपनियों को पहुंचाया जा रहा है ये तो ?

24 अप्रैल 2017

"टोनी के मस्तिष्क में एक्सीडेंट के बाद ऐसा क्या हुआ जिसने उसको संगीत के लिए दीवानापन पैदा करके संगीतकार बना दिया "



"टोनी के मस्तिष्क में  एक्सीडेंट के बाद ऐसा क्या हुआ जिसने उसको संगीत के लिए दीवानापन पैदा करके संगीतकार बना दिया "


1952  में जन्मे  डॉ टोनी सीकोरिआ , नॉर्विच न्यूयार्क के चेनंगो मेमोरियल हॉस्पिटल के ऑर्थोपेडिक सर्जन थे।  उनका संगीत से कोई खास लगाव नहीं था सिवाय कभी कभार रॉक-एन -रोल सुन लेने के।


1994 में अल्बेनी न्यू यॉर्क में एक पब्लिक टेलीफोन में फ़ोन करने के बाद वो जैसे ही बाहर आये उनके ऊपर बिजली गिर गयी।  उनका हार्ट काम करना बंद कर दिया। सौभाग्य से एक और महिला जो उसी समय फ़ोन करने के लिए इंतज़ार कर रही थी वह आई सी यु की ट्रेंड नर्स थी। उसने तत्काल टोनी को प्राथमिक उपचार दिया और उसके हार्ट को पंप करके पुनः जीवित किया।  टोनी ने अपने अनुभव में बताया की उसको महसूस हुआ की उसका शरीर जमीन पर रखा हुआ है और उसके चारों तरफ नीली सफ़ेद रौशनी  से ढका हुआ है। बिजली गिरने से उसके पावों और चेहरे पर इलेक्ट्रिकल बर्न हो गया था।
इस एक्सीडेंट के  कुछ हफ्ते बाद टोनी ने  याददाश्त में कमी और थकान की शिकायत   को लेकर न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह ली।  एम् आर आई और सी टी स्कैन इ इ जी नार्मल आया। तीन हफ्ते में टोनी की एनर्जी वापस आ गयी और उसके दो हफ्ते बाद याददाश्त वाली समस्या भी सुधर गयी।  टोनी ने वापस हॉस्पिटल ज्वाइन कर लिया।

उसके बाद कुछ दिन ही बीते होंगे की टोनी को पियानो सुनने की तीव्र इच्छा हुई। उसने पिआनो खरीद कर सीखना भी शुरू कर दिया।  अचानक ने उसका मस्तिष्क  संगीत  के विचारों से पूरी तरह से आच्छादित हो गया। टोनी के पूरे 42 वर्ष में कभी भी संगीत का जुड़ाव नहीं था जबकि बिजली गिरने  के तीन माह में उसने अपना पूरा समय संगीत सीखने और संगीत की धुने रचने में ही लगाया।

कुछ सालों ने टोनी ने संगीत के प्रदर्शन में भी हिस्सा लिया।





न्यूरोलॉजिस्ट डॉ ओलिवर सैक ने अपनी किताब में इस केस का उल्लेख किया है। 

22 अप्रैल 2017

"योगी परिवार के सभी महानुभाव आज 7 मार्च है, ठीक 65 साल पहले एक शरीर हमारे पास रह गया और एक सीमित दायरे में बंधी हुई आत्‍मा युगों की आस्‍था बनकर फैल गई " नरेंद्र मोदी

"योगी परिवार के सभी महानुभाव आज 7 मार्च है, ठीक 65 साल पहले एक शरीर हमारे पास रह गया और एक सीमित दायरे में बंधी हुई आत्‍मा युगों की आस्‍था बनकर फैल गई । 

आज हम 7 मार्च को एक विशेष अवसर पर एकत्र आए है| मैं श्रीश्री माता जी को भी प्रणाम करता हूं कि मुझे बताया गया कि वहां लॉस एंजेलस में वो भी इस कार्यक्रम में शरीक हैं | 

जैसा कि स्‍वामी जी बता रहे थे कि दुनिया के 95 प्रतिशत लोग अपनी मातृभाषा में योगी जी की आत्‍मकथा को पढ़ सकता है लेकिन उससे ज्‍यादा मुझे इस बात पर मेरा ध्‍यान जाता है क्‍या कारण होगा कि दुनिया में जो इंसान जो न इस देश को जानता है, ना यहां की भाषा को जानता है, न इस पहनाव का क्‍या अर्थ होता है ये भी उसको पता नहीं, उसको तो ये एक कास्‍टूयम लगता है, क्‍या कारण होगा कि वो उसको पढ़ने के लिए आकर्षित होता होगा। क्‍या कारण होगा कि उसे, अपनी मातृभाषा में तैयार करके औरों तक पहुंचाने का मन करता होगा। इस आध्‍यात्मिक चेतना की अनुभूति का ये परिणाम है कि हर कोई सोचता है कि मैं ही कुछ प्रसाद बांटू, हम मंदिर में जाते हैं थोड़ा सा भी प्रसाद मिल जाता है तो घर जाकर भी थोड़ा-थोड़ा भी जितने लोगों को बांट सकें बांटते हैं। वो प्रसाद मेरा नहीं है, न ही मैंने उसको बनाया है लेकिन ये कुछ पवित्र है मैं बांटता हूं तो मुझे संतोष मिलता है। 

योगी जी ने जो किया है हम उसे प्रसाद रूप लेकर के बांटते चले जा रहे हैं तो एक भीतर के आध्‍यत्मिक सुख की अनुभूति कर रहे हैं। और वही मुक्ति के मार्ग वगैरह की चर्चा हमारे यहां बहुत होती है, एक ऐसा भी वर्ग है जिसकी सोच है कि इस जीवन में जो है सो है, कल किसने देखा है कुछ लोग हैं जो मुक्ति के मार्ग को प्रशस्‍त करने का प्रयास करते है लेकिन योगी जी की पूरी यात्रा को देख रहे हैं तो वहां मुक्ति के मार्ग की नहीं अंतरयात्रा की चर्चा है। आप भीतर कितने जा सकते हो, अपने आप में समाहित कैसे हो सकते हो। त्रुटिगत विस्‍तार एक स्‍वभाव है, अध्‍यात्‍म भीतर जाने की एक अधिरत अनंत मंगल यात्रा है और उस यात्रा को सही मार्ग पर, सही गति से उचित गंतव्‍य पर पंहुचाने में हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने, आचार्यों ने, भगवतिंयों ने, तपस्वियों ने एक बहुत बड़ा योगदान दिया है और समय समय पर किसी न किसी रूप में ये परंपरा आगे बढ़ती चली आ रही है। 

योगी जी के जीवन की विशेषता, जीवन तो बहुत अल्‍प काल का रहा शायद वो भी कोई अध्‍यात्मिक संकेत होगा। कभी कभी हठियों को बुरा माना जाता है लेकिन वो प्रखर रूप से हठ योग के सकारात्‍मक पहलुओं के तर्क वितर्क तरीके से व्‍याख्‍या करते थे। लेकिन हर एक को क्रिया योग की तरफ प्रेरित करते थे अब मैं मानता हूं योग के जितने भी प्रकार है उसमें क्रिया योग ने अपना एक स्‍थान निश्चित किया हुआ है। जो हमें हमारे अंतर की ओर ले जाने कि लिए जिस आत्‍मबल की आवश्‍यकता होती है। कुछ योग ऐसे होते है जिसमें शरीर बल की जरूरत होती है क्रिया योग ऐसा है जिसमें आत्‍मबल की जरूरत होती है जो आत्‍मबल की यात्रा से ले जाता है और इसलिए, और जीवन का मकसद कैसा, बहुत कम लोगों के ऐसे मकसद होते हैं योगी जी कहते थे भाई मैं अस्‍पताल में बिस्‍तर पर मरना नहीं चाहता। मैं तो जूते पहनकर के कभी महाभारती का स्‍मरण करते हुए आखिरी विदाई लूं वो रूप चाहता हूं। यानि वे भारत को विदाई, नमस्‍ते करके चल दिए पश्चिम की दुनिया को संदेश देने का सपना लेकर के निकल पड़े। लेकिन शायद एक सेकंड भी ऐसी कोई अवस्‍था नहीं होगी कि जब वो इस भारत माता से अलग हुए हों।



मैं कल काशी में था, बनारस से ही मैं रात को आया और योगी जी के आत्‍मकथा में बनारस में उनके लड़क्‍कपन की बातें भरपूर मात्रा में, शरीर तो गोरखपुर में जन्‍म लिया लेकिन बचपन बनारस में बीता और वो मां गंगा और वहां की सारी परंपराएं उस आध्‍यात्मिक शहर की उनके मन पर जो असर था जिसने उनके लड़क्‍कपन को एक प्रकार से सजाया, संवारा, गंगा की पवित्र धारा की तरह उसका बहाया और वो आज भी हम सबके भीतर बह रहा है। जब योगी जी ने अपना शरीर छोड़ा उस दिन भी वो कर्मरथ थे अपने कर्तव्‍य पद पर। अमेरिका जो भारत के जो राजदूत थे उनका सम्‍मान समारोह चल रहा था और भारत के सम्‍मान समारोह में वो व्‍याख्‍यान दे रहे थे और उसी समय शायद कपड़े बदलने में देर लग गई उतनी ही देर नहीं लगी ऐसे ही चल दिए और जाते-जाते उनके जो आखिरी शब्‍द थे, मैं समझता हूं कि देशभक्ति होती है मानवता का, अध्‍यात्‍म जीवन की यात्रा को कहां ले जाती है उन शब्‍दों में बड़ा अद्भुत रूप से, आखिरी शब्‍द हैं योगी जी के और उसी समारोह में वो भी एक राजदूत का, सरकारी कार्यक्रम था, और उस कार्यक्रम में भी योगी जी कह रहे हैं जहां गंगा, जंगल, हिमालय, गुफायें और मनुष्‍य ईश्‍वर के स्‍वपन देखते है यानि देखिए कहां विस्‍तार है गुफा भी ईश्‍वर का स्‍वपन देखता है, जंगल भी ईश्‍वर का स्‍वपन देखता है, गंगा भी ईश्‍वर का स्‍वपन देखता है, सिर्फ इंसान नहीं । 

मैं धन्‍य हूं कि मेरे शरीर ने उस मातृभूमि को स्‍पर्श किया। जिस शरीर में वो विराजमान थे उस शरीर के द्वारा निकले हुए आखिरी शब्‍द थे। फिर वो आत्‍मा अपना विचरण करके चली गई जो हम लोगों में विस्‍तृत होती है। मैं समझता हूं कि एकात्‍मभाव:, आदि शंकर ने अदैत्‍व के सिंद्धात की चर्चा की है। जहां द्वैत्‍य नहीं है वही अद्वैत्‍य है। जहां मैं नहीं, मैं और तू नहीं वहीं अद्वैत्‍य है। जो मैं हूं और वो ईश्‍वर है वो नहीं मानता, वो मानता है कि ईश्‍वर मेरे में है, मैं ईश्‍वर में हूं, वो अद्वैत्‍य है। और योगी जी ने भी अपनी एक कविता में बहुत बढि़या ढंग से इस बात को, वैसे मैं इसको, इसमें लिखा तो नहीं गया है। लेकिन मैं जब उसका interpretation करता था, जब ये पढ़ता था तो मैं इसको अद्वैत्‍य के सिंद्धात के साथ बड़ा निकट पाता था। 

और उसमें योगी जी कहते है, ‘’ब्रह्म मुझ में समा गया, मैं ब्रह्म में समा गया’’। ये अपने आप में अद्वैत्‍य के सिंद्धात का एक सरल स्‍वरूप है- ब्रह्म मुझ में समा गया, मैं ब्रह्म में समा गया। ‘’ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञै:’’ सब के सब एक हो गए। जैसे हम कहते है न ‘’कर्ता और कर्म’’ एक हो जाए, तब सिद्धि सहज हो जाती है। कर्ता को क्रिया नहीं करनी पड़ती और कर्म कर्ता का इंतजार नहीं करता है। कर्ता और कर्म एकरूप हो जाते है तब सिद्धि की अनोखी अवस्‍था हो जाती है। 

उसी प्रकार से योगी जी आगे कहते है, शांत, अखंड, रोमांच सदा, शांत, अखंड, रोमांच सदा, शांत, अखंड, रोमांच सदा के लिए जीती-जागती, नित्‍य-नूतन शांति, नित्‍य-नवीन शांति। यानि कल की शांति आज शायद काम न आए। आज मुझे नित्‍य, नूतन, नवीन शांति चाहिए और इसलिए यहां स्‍वामी जी ने आखिर में अपने शब्‍द कहे, ‘’ओउम् शांति-शांति’’। ये कोई protocol नहीं है, एक बहुत तपस्‍या के बाद की हुई परिणिती का एक मुकाम है। तभी तो ’ओउम् शांति, शांति, शांति की बात आती है। समस्‍त आशा और कल्‍पनाओं से परे, समस्‍त आशाओं और कल्‍पनाओं से परे आनंद देने वाला समाधि का परमानंद। ये अवस्‍था का वर्णन जोकि एक समाधि कविता में, योगी जी ने बड़े, बखूबी ढंग से हमारे सामने प्रस्‍तुत किया है और मैं समझता हूं कि इतनी सरलता से जीवन को ढाल देना और पूरे योगी जी के जीवन को देखे, हम हवा के बिना रह नहीं सकते। हवा हर पल होती है पर कभी हमें हाथ इधर ले जाना है तो हवा कहती नहीं है कि रुक जाओ, मुझे जरा हटने दो। हाथ यहा फैला है तो वो कहती नहीं कि रुक जाओ मुझे यहां बहने दो। योगी जी ने अपना स्‍थान उसी रूप में हमारे आस-पास समाहित कर दिया कि हमें अहसास होता रहे, लेकिन रुकावट कहीं नहीं आती है। सोचते है कि ठीक है आज ये नहीं कर पाता है कल कर लेगा। ये प्रतीक्षा, ये धैर्य बहुत कम व्‍यवस्‍थाओं और परम्‍पराओं में देखने को मिलता है। योगी जी ने व्‍यवस्‍थाओं औ को इतना लचीलापन दिया और आज शताब्‍दी हो गई, खुद तो इस संस्‍था को जन्‍म दे करके चले गए। लेकिन ये एक आंदोलन बन गया, आध्‍यात्‍मिक चेतना की निरन्‍तर अवस्‍था बन गया और अब तक शायद चौथी पीढ़ी आज इसमें सक्रिय होगी। इसके पहले तीन-चार चली गई। 

लेकिन न delusion आया और न diversion आया। अगर संस्‍थागत मोह होता, अगर व्‍यवस्‍थाकेंद्री प्रक्रिया होती तो व्‍यक्ति के विचार, प्रभाव, समय इसका उस पर प्रभाव होता। लेकिन जो आंदोलन काल कालातीत होता है, काल के बंधनों में बंधा नहीं होता है अलग-अलग पीढि़यां आती है तो भी व्‍यवस्‍थाओं को न कभी टकराव आता है, न दुराव आता है वो हल्‍के-फुल्‍के ढंग से अपने पवित्र कार्य को करते रहते है। 

योगी जी का एक बहुत बड़ा एक contribution है कि एक ऐसे व्‍यवस्‍था दे करके गए जिस व्‍यवस्‍था में बंधन नहीं है। तो भी जैसे परिवार को कोई संविधान नहीं है लेकिन परिवार चलता है। योगी जी ने भी उसकी ऐसी व्‍यवस्‍था रची कि जिसमें सहज रूप से प्रक्रियाएं चल रही है। उनके बाहर जाने के बाद भी वो चलती रही और आज उनके आत्‍मिक आनंद को पाते-पाते हम लोग भी इसको चला रहे है। मैं समझता हूं ये बहुत बड़ा योगदान है। दुनिया आज अर्थजीवन से प्रभावित है, technology से प्रभावित है और इसलिए दुनिया में जिसका जो ज्ञान होता है, उसी तराजू से वो विश्‍व को तोलता भी है। मेरी समझ के हिसाब से मैं आपका अनुमान लगाता हूं। अगर मेरी समझ कुछ और होगी तो मैं आपका अनुमान अलग लगाऊंगा, तो ये सोचने वाले की क्षमता, स्‍वभाव और उस परिवेश का परिणाम होता है। उसके कारण विश्‍व की दृष्टि से भारत की तुलना होती होगी तो जनसंख्‍या के संबंध में होती होगी GDP के संदर्भ में होती होगी, रोजगार-बेरोजगार के संदर्भ में होती होगी। तो ये विश्‍व के वो ही तराजू है। लेकिन दुनिया ने जिस तराजू को कभी जाना नहीं, पहचाना नहीं, भारत की पहचान का एक ओर मानदंड है, एक तराजू है और वही भारत की ताकत है, वो है भारत को आध्‍यात्‍म। देश का दुर्भाग्‍य है कि कुछ लोग आध्‍यात्‍म को भी religion मानते है, ये और दुर्भाग्‍य है। धर्म, religion, संप्रदाय ये और आध्‍यात्‍म बहुत अलग है। और हमारे पूर्व राष्‍ट्रपति अब्‍दुल कलाम जी बार-बार कहते थे कि भारत का आध्‍यात्मिकरण यही उसका सामर्थ है और ये प्रक्रिया निरंतर चलती रहनी चाहिए। इस आध्‍यात्‍म को वैश्विक फलक पर पहुंचाने का प्रयास हमारे ऋषियों-मुनियों ने किया है। योग एक सरल entry point है मेरे हिसाब से| दुनिया के लोगों को आप आत्मवत सर्वभूतेषु समझाने जाओगे तो कहाँ मेल बैठेगा, एक तरफ जहां eat drink and be merry की चर्चा होती है वहा तेन त्यक्तेन भुन्जिता: कहूंगा तो कहा गले उतरेगा। 

लेकिन मैं अगर ये कहूं कि भई तुम नाक पकड़ करके ऐसे बैठो थोड़ा आराम मिल जाएगा तो वो उसको लगता है चलो शुरू कर देते है। तो योग जो है वो हमारी आध्‍यात्मिक यात्रा का entry point है कोई इसे अंतिम न मान लें।लेकिन दुर्भाग्‍य से धन बल की अपनी एक ताकत होती है धनवृत्ति भी रहती है। और उसके कारण उसका भी कमर्शियलाइजेशन भी हो रहा है इतने डालर में इतनी समाधि होगी ये भी... और कुछ लोगों ने योग को ही अंतिम मान लिया है| 

योग अंतिम नहीं है उस अंतिम की ओर जाने के मार्ग का पहला प्रवेश द्वार है और कहीं पहाड़ पर हमारी गाड़ी चढ़ानी हो वहां धक्‍के लगाते हैं गाड़ी बंद हो जाती है लेकिन एक बार चालू हो जाए तो फिर गति पकड़ लेती है, योग का एक ऐसा एन्‍ट्रेस पांइट कि एक बार पहली बार उसको पकड़ लिया निकल गए फिर तो वो चलाता रहता है। फिर ज्‍यादा कोशिश नहीं करनी पड़ती है वो प्रक्रिया ही आपको ले जाती है जो क्रिया योग होता है। 

हमारे देश में फिर काशी की याद आना बड़ा स्‍वाभाविक है मुझे संत कबीर दास कैसे हमारे संतो ने हर चीज को कितनी सरलता से प्रस्‍तुत किया है संत कबीर दास जी ने एक बड़ी मजेदार बात कही है और मैं समझता हूं कि वो योगी जी पर पूरी तरह लागू होती है, उन्‍होंने कहा है अवधूता युगन युगन हम योगी...आवै ना जाय, मिटै ना कबहूं, सबद अनाहत भोगी ...कबीर दास कहते हैं योगी, योगी तो युगों युगों तक रहता है... न आता है न जाता है... न ही मिटता है। मैं समझता हूं आज हम योगी जी के उस आत्मिक स्‍वरूप के साथ एक सहयात्रा की अनुभूति करते हैं तब संत कबीर दास की ये बात उतनी ही सटीक है कि योगी जाते नहीं हैं, योगी आते नहीं है वो तो हमारे बीच ही होते हैं | 

उसी योगी को नमन करते हुए आपके बीच इस पवित्र वातावरण में मुझे समय बिताने का सौभाग्‍य मिला, मुझे बहुत अच्‍छा नहीं लगा फिर एक बार योगी जी की इस महान परंपरा को प्रणाम करते हुए सब संतों को प्रणाम करते हुए और आध्‍यत्मिक यात्रा को आगे बढ़ाने में प्रयास करने वाले हर नागरिक के प्रति आदर भाव व्‍यक्‍त करते हुए मेरी वाणी को विराम देता हूं। धन्‍यवाद| "
 श्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री 


http://www.narendramodi.in/hi/text-of-speech-pm-modi-releases-special-commemorative-postage-stamp-on-100-years-of-yogoda-satsanga-math-534641

19 अप्रैल 2017

“Why Now Is The Time To Crush It! Cash In On Your Passion” by Gary Vaynerchuk

Notes on “Why Now Is The Time To Crush It! Cash In On
Your Passion” by Gary Vaynerchuk


Gary’s checklist for creating your personal brand:
    1. Identify your passion
    2. Make sure you can think of at least 50 awesome blog topics to ensure stickiness
    3. Answer the following questions:
      • Am I sure my passion is what I think it is?
      • Can I talk about it better than anyone else? 
      • Name your personal brand. You don’t have to refer to it anywhere in your content, but you should have a clear ideas of what it is. For example, “the no-be real-estate agent”, “The connoisseur of cookware”, “The cool guide to young adult books boys will love to read”.
      • Buy your user name .com and .tv if possible at GoDaddy.com
      • Choose your medium: video, audio, written word
      • Start a WordPress or Tumblr account
      • Hire a designer
      • Include a Facebook Connect link, Call-to-Action buttons, Share Functions and a button that invites people to do business with you in a prominent place on your blog
      • Create a Facebook fan page
      • Sign up for Ping.fm or TubeMogul and select all the platforms to which you want to distribute your content. Choosing Twitter and Facebook is imperative; the others you can select according to your needs and preference
      • Post your content
      • Start creating community by leaving comments on other people’s blogs and forums and replying to comments to your own comment
      • Use Twitter Search (or Search.Twitter) to find as many people as possible talking about your topic, and communicate with them
      • Use blogsearch.google.com to find more blogs that are relevant to the subject
      • Join as many active Facebook fan pages and groups relating to your blog topic as possible
      • Repeat steps 12 through 16 over and over and over and over and over
      • Do it again
      • And again
      • When you feel your personal brand has gained sufficient attention and stickiness, start reaching out to advertisers and begin monetising
      • Enjoy the ride