10 जुलाई 2013

वास्तविकता यह है की उसके पास कोई भी उत्तर नहीं है

सभी गुरुओं और ज्ञानियो के पास जीवन की समस्याओं को लेकर जिज्ञासु जाते है ...
इस सदी के सबसे महान दार्शनिक गुरु ने इस बात को कितनी सरलता और स्पष्टता से कहा है "तुम्हारी समस्याओं को हल करने का अर्थ है तुम्हे एक उत्तर देना जो तुम्हे बौद्धिक रूप से संतुष्ट करता हो और तुम्हारी समस्याओं को समाप्त करने के लिये एक विधि देना जो तुम्हे स्वयं अवगत करा दे की समस्या जैसा कुछ है ही नहीं :समस्याएँ हमारी स्वयं की कृतियाँ है और उसके लिये किसी उत्तर की आवश्यकता नहीं है।
प्रबुद्ध चेतना के पास इसका कोई उत्तर नहीं है।इसका सौन्दर्य यही है की इसके पास कोई प्रश्न नहीं है। इसके सभी प्रश्न समाप्त हो चुके है ,तिरोहित हो चुके है। लोग दूसरी तरह से सोचते है की प्रबुद्ध व्यक्ति के पास हर बात का उत्तर होना चाहिए।और वास्तविकता यह है की उसके पास कोई भी उत्तर नहीं है।उसके पास कोई प्रश्न ही नहीं है, बिना प्रश्नों के उसके पास कोई उत्तर कैसे हो ?
कोई प्रश्न नहीं जनता कोई उत्तर नहीं जानता। वास्तव में न तो कोई प्रश्न है न ही कोई उत्तर है:विचारों में जिन भ्रांतियों में जीने का एक ढंग है।तब लाखों प्रश्न है और लाखों उत्तर :और प्रत्येक प्रश्न फिर और सैकड़ों प्रश्न ले आता है और इसका कोई अंत नहीं है।
लेकिन जीने का एक दूसरा ढंग भी है :होश पूर्वक जीना -तब न उत्तर है न प्रश्न है।
अस्तित्व प्रश्न और उत्तरों के विषय में पूर्णतयः मौन है।"
 मैने भी खूब चक्कर लगाया और अंत में पूरी यात्रा करके वहीँ आ पंहुचा जहाँ से शुरू किया था ....मेरे गाइड ने मुझे इस यात्रा में हमेशा ही कहा की मै तुम्हे कोई उत्तर नहीं दे रहा हूँ बल्कि तुम्हारे प्रश्नों को बुहारी लगा कर साफ़ कर रहा हूँ 

डांस आइटम

बहुत सारा वक्त काम काज में ही बीत जाता है ..................दर्द और हालत के मायने  समझते . इलाज के तरीकों में जिन दवाओं का इस्तेमाल होता है अब मै खुद भी उस फेहरिस्त में शामिल हो चूका हूँ .................
एक भाई को अपने एक साल का वादा कर दिया है ...........उनका एक प्रोग्राम करना है ....... हमको स्टेज के डांस आइटम सिखाने के लिये भाई को एक ऊँचे जमात की काली सीरत और सूरत की औरत ने एक डांस मास्टर की सिफारिश की है ...........अब हमारे दोस्तों में अपना  गिन्नी ही हमारा मास्टर है ......भाई को बहुत मशक्कत के बाद राज़ी कर पाया ....
प्रोग्राम की रिहर्सल में कई किरदार के एब्सेंट के बात हमारे लक्की ,तारा ,और नितिन ने अपने रोल में जान डाल  दी ...........समीर भाई को शामिल करके उनके भरोसे को कायम किया ..........गिन्नी तो लाजवाब था ही .मेरा काम उस धागे की तरह था जिस पर इस प्रोग्राम को पिरोना था ...
कुछ ऐसे भी लोग थे जिनको अपने पर इतना गुमान था की हमारे प्रोग्राम को लानत भेजने के लिये मिन्नतें कर रहे थे ...बू आ रही थी गिन्नी को .उसने कहा की नशा है मैने कहा कुछ जल रहा है ..
स्टेज पर प्रोग्राम का एक हिस्सा ही हो पाया ........इतने पर भी इसने महफ़िल लुट लिया .........
दो तिहाई हिस्से में तारा लक्की मेरा और समीर भाई का किरदार था ........


8 जुलाई 2013

" आते जाते रहोगे तो हो जाएगा "

मै १९९९ में    मेडिकल कालेज में पढ़  रहा था .उसी समय योगानंद जी की योगी कथामृत को पढ़ कर अप्रतिम आनंद आया .इसके पहले मई विवेकानंद रामकृष्ण भावधारा की बहुत सी किताबें पढ़ चूका था .इसके बाद से बीच में ओशो ( भगवान्  श्री रजनीश ) का बहुत सारा साहित्य अध्ययन  चुका था .


किताबों को पढ़कर मन में भाव आया की अब ध्यान का अनुभव लिया जाय .इसके लिये मै गुढ़यारी  स्थित ओशो आश्रम में जाने लगा .मेरे मित्र गिन्नी को मै ओशो की किताबों की कई कई बातें बताया करता था .हम दोनों में ओशो और अन्य विषयों पर खूब चर्चा होती थी .गिन्नी  ने हमारी चर्चा का उल्लेख इसी दौरान जीतेन्द्र उपाध्याय से किया . जितेन्द्र उपाध्याय ने गिन्नी से  कहा " इतना जो तुम और तुम्हारे दोस्त ओशो की बातें करते हो फिर भी तुम ओशो को नहीं जान पावोगे .अगर ओशो को समझना हो तो एक बार आकर बुढा पारा  वाले स्वामी जी से मिलो .वहीँ  असली बात जान पावोगे. गुड़यारी  वाले ध्यान केंद्र में कुछ भी नहीं मिलेगा ."
यह बात गिन्नी ने मुझे बताई .यह सुनकर मेरे मन में तीव्र ईच्छा हुई वहां जाने की .



रविवार  शाम  ६ जून १९९९ को मै और गिन्नी जितेन्द्र उपाध्याय से मिलने और बुढा पारा जाने के लिये निकले .जितेन्द्र उपाध्याय उस समय पेंशन  बाड़ा चौक में मिला करते थे .मै और गिन्नी पेंशन  बाड़ा चौक में जाकर जितेन्द्र को खोजने लगे .बहुत खोजने के बाद वो नहीं मिला तो मैने  बुढा पारा जाकर ध्यान केंद्र खोजने का  तय किया .


मैने सोचा हम लोग इतनी समय से रायपुर में रह रहे है और इतने बार बुढापारा आ जा चुके है की ध्यान केंद्र जरुर खोज लेंगे .बूढ़ापारा में खूब गलियों और चौराहों पर खोजा पर कोई रजनीश का ध्यान केंद्र नहीं मिला .मै गिन्नी पर नाराज भी हुआ की तू इतना बुढा पारा आता है तू भी नहीं जनता .जितेन्द्र से पता ही पूछ कर रख लिया होता तो इतना भटकना नहीं पड़ता .


खैर खोजते खोजते हम लोग श्याम टाकिज चौक पर एक पान ठेले वाले से पूछने लगे .उसने तो साफ़ मना कर दिया की ऐसी कोई जगह वो नहीं जानता. वहां पान ठेले पर खडे एक व्यक्ति ने जो हमारी बात सुन रहा था उसने हमसे बात की .उसने अपने दोस्त से चर्चा की कि बहुत पहले बोस जी के घर में रजनीश का नाच गाना होता था .जब वो दोनों सहमत हो गये तो उन्होने हमे बताया कि हनुमान मंदिर चौक के पास गुड़वंत व्यास के घर या गंगाराम शर्मा के घर के पास बोस जी के घर में जाकर पता कर  लो .


हमने उनका धन्यवाद किया और निकले .गिन्नी व्यास जी का घर जानता था .हम दोनों व्यास जी के घर के आगे ही आये थे कि एक घर कि दूसरी  मंजिल में एक ओशो का चोगा पहने हुवे एक व्यक्ति दीखे .मैने उस घर के सामने अपनी स्कूटर जा कर रोक दी .घर के सामने कि चौखट पर दो महिलाऐं बैठी थी और सामने बहुत सी गाड़ियाँ खड़ी थी .हम कुछ देर रुक कर अनुमान लगाने लगे कि किस घर में ध्यान केंद्र  होगा तभी उन महिलाओं ने कहा कि उस जगह गाड़ी खड़ी कर दो और पीछे के रास्ते से दूसरी मंजिल के हाल में चले जावो  .


मैने और गिन्नी ने उनकी आज्ञा का पालन किया .एक घुमावदार सीढ़ी से ऊपर जाकर दूसरी मंजिल पर पहुंचे . वहां एक हाल में खचाखच लोग जमा थे और ओशो का ध्यान प्रयोग चल रहा था .ध्यान प्रयोग के बाद कुछ लोग चले गये पर कुछ बडे बुढे ध्यान  केंद्र के संचालक जी के पास जाकर बातें कर रहे थे .संचालक महोदय ओशो कि पुरानी तस्वीरों को दिखा कर उनसे ओशो के बारे में बातें कर रहे थे .वहां हमे शामिल नहीं किया गया था और हम अजनबी भी थे .


गिन्नी ने मुझे एक पतले दुबले युवा   व्यक्ति से मिलवाया और कहा कि यही जितेन्द्र उपाध्याय है .मैने अपना परिचय दिया .उसने भी अपना परिचय दिया कि वो दुर्गा कालेज में पढ़ता है .हम दोनों में बातें होने लगी .मुझे लगा कि जितेन्द्र मुझ पर ज्ञान  दीखा रहा है तो मैने भी उसके सामने अपना ज्ञान झाड़ दिया. तब जितेन्द्र ने    कहा " आप थोडा देर रुकिये .अभी गुरुदेव आये हुवे सज्जनों से बाते कर रहे है .जब वो फ्री वो जाएँ तब आप सारी बातों कि चर्चा उनसे कर लीजिएगा ." हमको एक दुबले उम्र दराज सज्जन जो ओशो चोगा पहने हुवे थे ने प्रेम से बीतने के लिये कहा .


मै इंतज़ार करने लगा .गिन्नी जितेन्द्र से और बहुत सारी बात करने लगा .

अंत में जब सब लोग चले गये तब संचालक महोदय जिनको जितेन्द्र ने गुरुदेव सम्भोधित किया था उनके सामने हम लोग बैठे .लोग उन्हे स्वामी जी कहकर बुला रहे थे .स्वामीजी बहुत सुंदर सफ़ेद वस्त्र धारण किये थे .उनकी दाढ़ी थी और वो बहुत ही जादा आकर्षक लग रहे थे .उन्होने बहुत प्रेम से हमारा परिचय प्राप्त  किया. वो भगवान् श्री रजनीश का नाम सुनते ही उनके बारे में मुझे बताने लगे .मुझे ओशो के बारे में सुनकर बहुत आनंद आने लगा .उनहोने कहा कि जैसे तुम मुझसे बातें कर रहे हो वैसे ही मैने अपने गुरु भगवान् श्री रजनीश से बातें कि है .इतने में चोगे वाले सज्जन ने एक झोला ला कर रख दिया .उसमे ओशो के कई पत्र थे जो स्वामीजी को लिखे गये थे .स्वामीजी ने कहा ये तो इन लोगों ने संभाल कर रखा है ,पत्र कई सारे थे .

स्वामीजी बातें बता  ही रहे थे कि गिन्नी ने कहा कि मुझे  भूख लग रही है और घर में बिरयानी  बनी है .मुझको  स्वामीजी  की चर्चा में बहुत आनंद आ रहा था पर मै बेमन से उठा .सोचा कि कल अकेले आकर बात करूंगा .मेरे मन में प्रश्न भी था कि मै उनसे पूछूं कि मेरा कल्याण होगा कि नहीं .पर मैने नहीं पूछा.


स्वामीजी मुझे नीचे तक छोडने आये . जब मैने बाइक पर चढ़ने के पूर्व उनसे प्रणाम किया तो बिना किसी कारण के उन्होने मुझे कहा " आते जाते रहोगे तो हो जाएगा "

मै तो विस्मय से भर गया 
.कैसे इन्होने मेरे मन में उठे प्रश्न का उत्तर बिना पूछे ही दे दिया .
उन्होने अगर मेरे प्रश्न  का उत्तर दिया है तो मेरा कल्याण हो जायेगा यह मेरे लिये बहुत बड़ी बात थी .
यह सब बातें मेरे दिमाग में घूमने लगी. 
मैंने अगले दिन स्वामीजी के पास जल्दी जाने का निर्णय लिया .