6 मार्च 2013

छत्तीसगढ़ की संस्कृति और कबीर पंथ

छत्तीसगढ़ की संस्कृति और कबीर पंथ--
छत्तीसगढ़ संस्कृति की पहली और अंतिम पहचान है - उसकी मानवीयता और संवदेनशीलता। यही कबीरीय संदेश की भी मुख्य बातें हैं। समय चक्र के साथ जब कबीर का आगमन होता है और उनकी वाणीं वायुमंडल में गूंजती है, तब हवा की तरंगों पर अटखेलियाँ खेलती यह रागिणी यहां के लोक जीवन में झंकृत हो उठती है। इसलिए हम कबीर पंथ को बहुत गहराई से छत्तीसगढ़ी संस्कृति में परिव्याप्त देखते हैं।

कबीरीय चेतना आने से पहले मानों छत्तीसगढ़ की जीवन्त प्रकृति उसकी आगवानी के लिए बाँह फैलाये खड़ी थी। अविलम्ब वह चारों और फैलकर यहां के जीवन के साथ एकरस हो गई। इसलिए इस कबीरीय चेतना को हम छत्तीसगढ़ में उपलब्ध आदिवासी, सत्नामी, पिछड़ा वर्ग, ब्राह्मण, बौद्ध, जैन, सिक्ख, ईसाई, मुसलमान तथा और भी जितने मत-मतांतर हैं, सब में कमोवेश से इसे प्रतिध्वनित पाते हैं। इतना ही नहीं छत्तीसगढ़ के आस-पास अन्य क्षेत्रों में इस वाणी का प्रभाव देखा जा सकता है।

छत्तीसगढ़ की भूमि अनादिकाल से संतों - ॠषियों और मुनियों का प्रिय क्षेत्र रहा है। उनके प्रभाव से वह अपने यहां एक उदात्त स्वरुप को बना सका है। पर इस ऐतिहासिक कालखंड में हम कबीर पंथ को सर्वाधक रुप से यहां फैलते हुए देखते हैं। छत्तीसगढ़ के साधु संत और योगी भी आस-पास के क्षेत्रों में भ्रमण करते रहे और लोक चेतना जगाते रहे।

मूलभूत रुप से छत्तीसगढ़ संस्कृति लोक संस्कृति है। क्योंकि यह आदिवासी क्षेत्र है और आदिम जातियां यहां के मूल निवासी हैं। कबीर - कबीर की वाणी तथा उनका जीवन दर्शन सभी कुछ जनवादी है। उसका यही जनपदीय व्यक्तित्व छत्तीसगढ़ी संस्कृति के साथ सबसे अधिक तालमेल रखता है। जनता की आत्मपीड़ा, उसकी मौन ललकार, विश्वमानवता के मंदिर में समानता और प्रेम का अधिकार आदि वे सपने हैं, जो कबीरीय संदेश के मूल तत्व हैं। सह-अस्तित्व, पारस्परिक सहयोग, संतुलन आदि बातें जो छत्तीसगढ़ी संस्कृति की मूल बातें हैं, कितनी कबीरीय वाणी के कारण हैं और कितनी भारतीय संस्कृति के प्रभाव के कारण तथा कितनी छत्तीसगढ़ी संस्कृति की देन है, कह पाना असंभव है? किसने किसको कितना दिया और लिया, शायद यह राज तभी खुलेगा, जब प्रकृति के महामौन को वाणीं मिलेगी। तब इतिहास से कोई स्वर मुखरित होगा या फिर आकाश में कोई जीवन रागिणी लहरायेगी। हम तो केवल इतना ही कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति और छत्तीसगढ़ी संस्कृति तद्रूप और अद्वेैत हो गई हैं।

ऐसी जनश्रुति है कि कबीर दास केवल आये ही नहीं, परंतु बहुत समय तक यहां की प्रकृति के मोहपाश में बंध गये। यहां की प्रकृति ने इस अक्खड़-फक्खड़ वीतरागी और मस्तमौला को ऐसा बांधी कि बहुत समय तक मनन, ध्यान और तपस्या आदि करते रहे। गुरुनानक जी के साथ उनकी मुलाकात अमरकंटक के पास छ: किलोमीटर दूर कबीर चौरा में हुई थी।

""छत्तीसगढ़ में कबीर-मत के प्रचार व प्रसार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका महामना धर्मदास जी की थी। वे बांधवगढ़ के निवासी थे। उन्होंने कवर्धा को अपने धर्मोपदेश का केन्द्र बनाया। और कवर्धा के कबीर चौरे के महंत कालान्तर में गुरु धर्मदास जी के सीधे उत्तराधिकारी बने।''छत्तीसगढ़ की संस्कृति और कबीर पंथ--
छत्तीसगढ़ संस्कृति की पहली और अंतिम पहचान है - उसकी मानवीयता और संवदेनशीलता। यही कबीरीय संदेश की भी मुख्य बातें हैं। समय चक्र के साथ जब कबीर का आगमन होता है और उनकी वाणीं वायुमंडल में गूंजती है, तब हवा की तरंगों पर अटखेलियाँ खेलती यह रागिणी यहां के लोक जीवन में झंकृत हो उठती है। इसलिए हम कबीर पंथ को बहुत गहराई से छत्तीसगढ़ी संस्कृति में परिव्याप्त देखते हैं।










कबीरीय चेतना आने से पहले मानों छत्तीसगढ़ की जीवन्त प्रकृति उसकी आगवानी के लिए बाँह फैलाये खड़ी थी। अविलम्ब वह चारों और फैलकर यहां के जीवन के साथ एकरस हो गई। इसलिए इस कबीरीय चेतना को हम छत्तीसगढ़ में उपलब्ध आदिवासी, सत्नामी, पिछड़ा वर्ग, ब्राह्मण, बौद्ध, जैन, सिक्ख, ईसाई, मुसलमान तथा और भी जितने मत-मतांतर हैं, सब में कमोवेश से इसे प्रतिध्वनित पाते हैं। इतना ही नहीं छत्तीसगढ़ के आस-पास अन्य क्षेत्रों में इस वाणी का प्रभाव देखा जा सकता है।

छत्तीसगढ़ की भूमि अनादिकाल से संतों - ॠषियों और मुनियों का प्रिय क्षेत्र रहा है। उनके प्रभाव से वह अपने यहां एक उदात्त स्वरुप को बना सका है। पर इस ऐतिहासिक कालखंड में हम कबीर पंथ को सर्वाधक रुप से यहां फैलते हुए देखते हैं। छत्तीसगढ़ के साधु संत और योगी भी आस-पास के क्षेत्रों में भ्रमण करते रहे और लोक चेतना जगाते रहे।

मूलभूत रुप से छत्तीसगढ़ संस्कृति लोक संस्कृति है। क्योंकि यह आदिवासी क्षेत्र है और आदिम जातियां यहां के मूल निवासी हैं। कबीर - कबीर की वाणी तथा उनका जीवन दर्शन सभी कुछ जनवादी है। उसका यही जनपदीय व्यक्तित्व छत्तीसगढ़ी संस्कृति के साथ सबसे अधिक तालमेल रखता है। जनता की आत्मपीड़ा, उसकी मौन ललकार, विश्वमानवता के मंदिर में समानता और प्रेम का अधिकार आदि वे सपने हैं, जो कबीरीय संदेश के मूल तत्व हैं। सह-अस्तित्व, पारस्परिक सहयोग, संतुलन आदि बातें जो छत्तीसगढ़ी संस्कृति की मूल बातें हैं, कितनी कबीरीय वाणी के कारण हैं और कितनी भारतीय संस्कृति के प्रभाव के कारण तथा कितनी छत्तीसगढ़ी संस्कृति की देन है, कह पाना असंभव है? किसने किसको कितना दिया और लिया, शायद यह राज तभी खुलेगा, जब प्रकृति के महामौन को वाणीं मिलेगी। तब इतिहास से कोई स्वर मुखरित होगा या फिर आकाश में कोई जीवन रागिणी लहरायेगी। हम तो केवल इतना ही कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति और छत्तीसगढ़ी संस्कृति तद्रूप और अद्वेैत हो गई हैं।

ऐसी जनश्रुति है कि कबीर दास केवल आये ही नहीं, परंतु बहुत समय तक यहां की प्रकृति के मोहपाश में बंध गये। यहां की प्रकृति ने इस अक्खड़-फक्खड़ वीतरागी और मस्तमौला को ऐसा बांधी कि बहुत समय तक मनन, ध्यान और तपस्या आदि करते रहे। गुरुनानक जी के साथ उनकी मुलाकात अमरकंटक के पास छ: किलोमीटर दूर कबीर चौरा में हुई थी।

""छत्तीसगढ़ में कबीर-मत के प्रचार व प्रसार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका महामना धर्मदास जी की थी। वे बांधवगढ़ के निवासी थे। उन्होंने कवर्धा को अपने धर्मोपदेश का केन्द्र बनाया। और कवर्धा के कबीर चौरे के महंत कालान्तर में गुरु धर्मदास जी के सीधे उत्तराधिकारी बने।''

दामाखेड़ा आज भी भारतीय कबीर - पंथ में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। बिलासपुर संभाग में अधिकांशत: मुसलमान कबीर एवं कबीर-पंथ के लिए श्रद्धा रखते हैं। सभी अपना-अपना मत मानते हुये भी एक बिंदु पर आकर मिल जाते हैं, और वह है - महात्मा, युगपुरुष लोकनायक कबीर। चाहे ये पंथी हो या नहीं, उच्चवर्ग के हों या निम्न वर्ग के, शिक्षित हों या अशिक्षित पर निरक्षर-मसीहा और सत्यनिष्ठ गुरु के प्रति सबकी सामूहिक आस्था, विश्वास और भक्ति है। पनिका वह पिछड़ी जाति है, जो सर्वत्र प्राय: कबीर पंथी है। पनिका नाम भी प्रतीकात्मक है। पनिका अर्थात् (पानी + का)। कबीरदास जी को जन्म से ही मां ने त्याग दिया था। लहर तारा तालाब में एक पत्ते पर सोते हुये एक दूसरी मां को वे मिल गये थे।

"पनिका' जाति इसलिए अपने को पनिका कहलाना पसंद करती हैं। उसकी मान्यता है कि वह कबीर का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करती है।

""पनका द्रविड वर्ग की जनजाति है। छोटा नागपुर में यह "पान' जनजाति के नाम से जानी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि संत कबीर का जन्म जल से हुआ था और वे एक पनका महिला द्वारा पाले पोषे गये थे।''

पानी से पनका भये, बूंदन रचा शरीर।
आगे आगे पनका गये, पाछे दास कबीर।।

पनका प्रमुख रुप से छत्तीसगढ़ और विन्ध्य क्षेत्र में पाये जाते हैं। आजकल अधिसंख्य पनका कबीर पंथी हैं। "कबीरहा' कहलाते हैं।

{साभार :डॉ शिवप्रिया महापात्रा ignca /kabir}

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