1 जून 2011

जीवन उत्सव बने ,बसंत बने ,तो ही जानना की धर्म का स्वाद आया .



भगवान् श्री रजनीश (ओशो ) के  अनमोल पत्र 
 जो उन्होने स्वामी चिन्मय योगी (श्री रजत बोस )
 जी को लिखे 








७ अप्रैल १९८३ 
Oregon ( USA )
प्रिय चिन्मय योगी ,
              प्रेम 

"जीवन तो एक अवसर है -

जहाँ चाहो तो वरदान ही वरदान मिले ,

और चाहो तो अभिशाप ही अभिशाप .

वही उर्जा जो अभिशाप है ,वही ऊर्जा वरदान बन जाती है .

सब तुम पर निर्भर है .

इस जीवन के अवसर को वरदानों की वर्षा में बदलने की 

जीवन के अनूठे साज से संगीत उठाने की कला ही संन्यास है .

जीवन उत्सव बने ,बसंत बने ,तो ही जानना की धर्म  का स्वाद आया .

यह दुर्भाग्य ही है की अधिक लोग इस साज से शोरगुल भर उठाते है .

जीने की कला सीखो.ध्यान कला है. प्रेम कला है .संन्यास कला है ."

वहां सबको प्रेम ,

भगवान् श्री के आशीष 
माँ आनंद शीला