24 मई 2011

गुरुशिष्य परंपरा में लोकतान्त्रिक व्यवस्था


की मैं  एक बार  फिर  रंगीनियों में गर्क हो जाऊं 
मेरी हस्ती को तेरी एक नज़र आगोश में ले ले 
गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी 








गुरुदेव का आचरण मित्रवत ही है. वो कभी किसी को आज्ञा नहीं देते है .हम सभी को उनकी उपस्थिति में सभी प्रकार की बातें बोलने और जैसे मन चाहे बैठने की अनुमति  है . हम सभी उनसे मित्रों की भांति ही खुलकर  व्यवहार करते है . गुरुदेव से जब यह पूछा गया तो उन्होने इस बाबत बताया  " ओशो ने कहा था की मै अगली बार मौक़ा लगे तो अपने शिष्यों के साथ दोस्त बनकर मिलूंगा और बैठूंगा .मैने यहाँ गुरुशिष्य परंपरा में लोकतान्त्रिक व्यवस्था लायी है .पहले की वयवस्था में तानाशाही थी की गुरु एक प्रकार के शासक के रोल में होता था और आज्ञा पालन के आड़ में शिष्य अपने तरफ से दोहरा व्यव्हार करने लगता था .सारा कार्यक्रम स्वतंत्र ने होकर अकादमिक रुपरेखा का हो जाता था .इसी व्यवस्था की भगवान् श्री ने बहुत आलोचना की है और मुझे भगवान्  श्री के और मैत्री जी के कुशल मार्ग दर्शन में मित्रवत आचरण की देशना मिली है .वैसे भी तुम लोगों के साथ मित्र वत रहना जो मेरे बेटे के उम्र के है बाकि लोगों के लिये असंभव ही है ."
भगवान् श्री रजनीश 



"गुरुदेव के साथ मित्रवत होने से हमारे कल्याण के लिये उनकी आज्ञाएँ क्या है यह हम शिष्य कैसे जान पाएंगे?"
इस विषय पर गुरुदेव ने कहा " देखो कल्याण मित्र गुरु तुमको आदेश की भांति कभी भी आज्ञा नहीं देगा .पर वह यदि तुम्हे कहे की ऐसा होता तो अच्छा होता तो जानना की वह तुम्हे हित में है .यही उसकी कल्याणकारी आज्ञा का स्वरुप है .कल्याण मित्र सदगुरु की सलाह ही उसकी आज्ञा होती है ."

भगवान् श्री रजनीश 

ध्यान केंद्र में गुरु शिष्य परंपरा का स्वरुप बाकि जगहों से बिलकुल अलग ,मस्ती भरा और दोस्ताना है .



ओशो शिष्यों के साथ नृत्य मुद्रा में 


हम ऐसे अहले -नज़र  को सबुते हक़  के लिये 
अगर रसूल न आते तो सुबह काफी थी 

स्वामी चिन्मय योगी जी के साथ डॉ सत्यजीत साहू