23 मई 2011

मैत्रेय जी पूना आश्रम में मेरे सबसे बडे संरक्षक थे .

22 -5 -11  
गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी जी के साथ  स्वामी आनंद चैतन्य 
आज रविवार सत्संग का  दिन है .
मै सही समय पांच बजे शाम को ही चला गया .वहां जाकर कूलर में पानी भरा .गर्मियों के दिन में सत्संग हाल काफी गर्म हो जाता है .दो कूलर भी पूरे रूम को ठंडा नहीं कर पाते है.
सभी गुरुभाइयों को फ़ोन लगाया और आने को कहा .
गुरुदेव के घर में रिश्तेदार आये हुवे है .गुरुदेव उनसे  घर की बैठक में  बातें कर रहे है.
मुझे अपने घर से रात्रि के खाने की सब्जी लानी है इसलिये घर वापस गया .
पुनः ध्यान केंद्र में आकर देखा तो पिंकू ,सूरज ,हेमंत आ चुके है .


सूरज पिछले दो साल से लगातार आ रहा है .सूरज भिलाई यानि यहाँ से ४० किलोमीटर दूर से रविवार सत्संग के लिये आता है .इतनी दूर से लगातार सत्संग में आते रहना और यहाँ का काम भी करना यह सब देखकर सभी लोग सूरज से काफी प्रसन्न है .गुरुदेव भी उसकी इस सेवाभाव  की खूब तारीफ करते है .
गुरुदेव के मार्गदर्शन में खाना बनाते हुवे सूरज ,साथ में डॉ सत्यजीत  साहू 
एक प्रसंग में सूरज को यह लगा भी की अब सत्संग में लोग मेरी   बुराई  ही करेंगे पर गुरुदेव ने अपने प्रेम और आश्रीवाद से सूरज का मन बदल दिया .गुरुदेव के प्रति सूरज की आस्था और बढ gayi  .अब सूरज आश्रम में सर्वाधिक श्रम दान करता है .आज रविवार के भोजन बनाने का सारा भर सूरज ने अपने ऊपर लेकर भक्ति भाव और प्रेम से बनाकर सबको दीखाया  भी .
सूरज से गुरुदेव बातें कर रहें है .सूरज अपने घर की बातों को बता रहा है .गुरुदेव ने उसको बहुमूल्य मार्गदर्शन दे रहें है और घर के सदस्यों की मानसिकता बता रहें है .सूरज को अपने घरवालों को समझने में आसानी हो रही है


हेमंत के मित्र बाबा पात्रे अपने साथ एक और मित्र को लेकर आये अहि .गुरुदेव ने उनकी कुंडली देख कर जीवन में सुधार के लिये उपरत्न धारण करने की सलाह दी .

गुरुदेव के साथ हेमंत 
हेमंत कई प्रकार के प्रश्न गुरुदेव से पूछ रहे है जिसका समाधान गुरुदेव दे रहे है .
"गुरुदेव आपके पास जिसका भी काम बन जाता है वो फिर आना छोड़ देता है ?" हेमंत ने पूछा.
"देखो जब आप दवाई दुकान जाते हो तो जैसे ही आपको दवा मिल जाती है आप वहां खडे थोड़ी ने रहते हो .वैसे ही  यहाँ  आने वाले का जब काम बन जाता है वह चला जाता है .जैसे रितेश आया था की शादी नहीं हो रही है .पर अब जब शादी हो गयी तो नहीं आता है .अब उसको कोई दूसरी शादी तो नहीं करनी है .यह बहुत सरल है "  गुरुदेव ने कहा .

सत्संग में गुरुदेव बातें करते हुवे 
ग्रुरुदेव हेमंत को भगवान् श्री रजनीश जी की बातें बता रहे है .इसी बीच मै ध्यान केंद्र की संगृहीत चीजों की फाइल ले कर आया .गुरुदेव उस फाइल में दिखाकर ओशो और उनके व्यक्तित्व की कई बातें सब शिष्यों को बता रहे है .इसी बीच अनिल और अमित  भी आ  गये  .

 स्वामी आनंद मैत्रेय  जी दीक्षा देते हुवे 
स्वामी  आनंद मैत्रेय  जी दीक्षा देते हुवे 
गुरुदेव ने  स्वामी आनंद  मैत्रेय  जी के बारे में बताना शुरू किया " मैत्रेय  जी पूना आश्रम में  मेरे सबसे बडे संरक्षक थे .उन्होने आश्रम में मेरे लिये बहुत कुछ किया .ओशो ने मैत्रेय  जी के ऊपर मेरा दायित्व डाल दिया था .मैत्रेय  जी मुझको बहुत ही जादा प्रेम किया करते थे .उन्होने ही ओशो से मेरे संपर्क को आसान और प्रगाढ़ किया .मेरे सारे पत्रों को वो ही ओशो के पास जाकर दीखाते और मुझे उनके उत्तर दिलवाया करते थे ."
मैत्रेय  जी का अंतिम पत्र
मृत्यु के दिन दीक्षा देते हुवे    स्वामी आनंद मैत्रेय  जी 

"उन्होने अपनी व्यक्तिगत बात भी मुझे बताई थी  मैत्रेय  जी बहुत ही सहज और सरल थे .उनको मिलकर यह लगता ही नहीं था की वो राष्ट्रिय स्तर की राजनेता रह चुके थे .मैत्रेय  जी उपलब्ध व्यक्ति थे .उनके लिखे हुवे कई पात्र मेरे पास है .उन्होने अपनी मृत्यु के दिन की अंतिम फोटो और  पत्र मेरे लिए लिखा था जो बाद में ओशो ने मुझे दिया .यह पत्र उन्होने मृत्यु के दिन लिखा था .उनको मालूम था की उनकी मृत्यु होने वाली  है .उस दिन उन्होने अपना प्रेस का सारा काम किया .आश्रम में दीक्षा दी .उसी की फोटो यहाँ है .अपने रूम गये .काफी पी अंतिम प्रणाम लिखा कर मुझको पत्र लिखा फिर अपना देह त्याग दिया .बहुत महान थे  मैत्रेय जी .भगवान्  श्री रजनीश के आश्रम में  ओशो के रूम में किसी भी समय आने जाने की विशेष इजाजत थी उनको .एक मात्र व्यक्ति मैत्रेय  जी है जिनके शरीर को मृत्यु के बाद  ओशो ने अपने पोडियम पर रखकर अपने हाथों से फूल अर्पित किया था . पूना आश्रम में भी उनकी ओशो के बाद नम्बर दो की  ईज्जत  थी . आश्रम में उन्होने लोगों को बता रखा था की मै उनका भतीजा हूँ .इसी कारण से मुझे आश्रम में इतना मान मिलता था और मै आश्रम में रहने वालों के बीच लोकप्रिय हो पाया ."

फाइल  में बहुत सारे दस्तावेज थे जो भगवान् श्री के समय की घटना क्रम को बता रहे थे .गुरुदेव भगवान् श्री के समय की अपनी स्थिति और साधना के बारे में, दस्तावेज को दिखा कर बातें बता रहे थे .
भगवान श्री के रंग में रंगे स्वामी चिन्मय योगी ,माँ प्रेम अर्चना ,एवं पुत्र  अनुराग 
आगे गुरुदेव ने कहा " इस सबको देख कर ही पता लगता है की मैने भगवान् के प्रेम में डूब कर कितनी मेहनत की है और मेरा जीवन किस प्रकार उनके प्रेम में रंगा हुआ था ."

अनुराग भैया भी रविवार का भोजन ध्यान केंद्र में करे है .कई प्रकार की पारिवारिक बातों का जिक्र वो हमारे बीच कर रहे थे .गुरुदेव ने भी उनको बहुत अमूल्य मार्गदर्शन दिया .उनको भी आजकल सत्संग में आने में मजा आता है और उनकी हमारे बीच बैठने की   झिझक ख़त्म  हो गयी है .














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