22 मई 2011

ज्योतिष फलादेश के तीन महत्वपूर्ण गुर


 गुरुदेव  स्वामी चिन्मय योगी जी के साथ स्वामी आनंद चैतन्य 
ज्योतिष फलादेश  के तीन महत्वपूर्ण गुर :-


  १) सी बी आई  ( c.b.i  )

  २) टास्क  ( t.a.s.k.)

  ३)आइ पी सी   ( i.p.c.)



 ज्योतिष के आधुनिक  महर्षि के एन राव जी ने फलादेश के लिये कुछ महत्वपूर्ण  फार्मूले तैयार किये है उनमे सी बी आई  पहला फार्मूला है .


सी .बी आई .( कलेक्टेड .बैकग्राउंड ,इन्फार्मेसन )

ज्योतिष को अपने कुंडली विश्लेषण सम्बन्धी तथ्य एक कागज पर पहले से लिखकर तैयार रखने चाहिये .जातक के आने पर यह कागज उसे देकर उसकी राय ले लेनी चाहिये . ध्यान रहे की यह प्रक्रिया कम से कम दस वर्षों  के समय में बीस हजार से जादा कुंडलियाँ परख चूका अनुभवी ज्योतिष ही अपना सकता है .यह तरीका खतरनाक मगर चमत्कारिक है जो भावी शोध के लिये भरपूर आधार सामग्री तैयार कर देता है . यही सी .बी .आई . (collected background information ) है .

संदिग्ध और छुटपुट जानकारी के आधार पर फलित करना असंगत होता है .इसलिये सी.बी.आई. तरीका बेहद जरुरी  है .ऐसा करके ही ज्योतिषी प्रश्नकर्ता का अच्छा दोस्त दार्शनिक और मार्गदर्शक साबित हो सकता है .

जब से यह महान  दैवीय विज्ञानं ज्योतिष ऋषियों के पावन आश्रम से निकलकर आधुनिक बाजार में पहुंचा है ,तब से ज्योतिषी की निष्ठा  पर सवालिया निशान लग गया है और इस विधा में विकृति भी आ गयी है .

किसी ईमानदार ज्योतिष को पहले सी .बी .आई . गुर से अपने जातक को संतुस्ट  करना चाहिये .उसे सामाजिक आर्थिक राजनितिक अस्थिरता के इस दौर में विभिन्न ज्योतिषीय योगों के  नए और व्यापक अर्थ खोजने चाहिये .

  
टास्क (  TASK ,   थीसिस,एंटी थीसिस ,सिंथेसिस ,काइंड्स ऑफ़ सिंथेसिस )

पक्ष (थीसिस )
ज्योतिष के सभी ग्रंथों में ग्रहों की उच्चता तथा नीचता के विशिस्ट अर्थ दिया गया है .इसे ही थीसिस (टी) कहते है .इसे दिमाग में रखे और इसे लेकर दुराग्रही न बने .उदहारण के तौर पर " यदि किसी की कुंडली में शुक्र नीच का हो तो भिखारी बनता है " यह कथन मात्र है परम सत्य नहीं .

प्रतिपक्ष ( एंटी थीसिस )
कई वर्षों के अभ्यास से ही कोई ज्योतिष यह जान पता है की जिन व्यक्तियों की कुंडली में नीच के  ग्रह हों , वे अपने जीवन में धन संचय करने में बेहद कामयाब होते है .नीच के ग्रह के सकारत्मक पहलु और अपवादों को लेकर ज्योतिषी से चुक हो सकती है .यहाँ थीसिस उलट जाती है जिसे हम    (ए)   एंटी थीसिस कहते है . 

तालमेल (सिंथेसिस )
जब आप थीसिस और एंटी थीसिस को आमी सामने रखते है तो इनके बीच तालमेल या सिंथेसिस (एस ) सामने आता है .यह सिंथेसिस या सार आपको बताता है की नीच के ग्रह में बुरे के साथ कुछ अच्छाई  भी छुपी हो सकती है .

सामंजस्य ( काइंड्स ऑफ़ सिंथेसिस )

गहन अनुभव के साथ विकसित होने वाली विचारमंथन की प्रक्रिया से ज्योतिषी ग्रहों की स्थिति व् योगों के विभिन्न अर्थ जानने समझने लगता है .इसे आप काइंड्स ऑफ़ सिंथेसिस ( के ) कह सकते है .
इस तरह टास्क से आशय है - थीसिस  ,एंटी- थीसिस , सिंथेसिस ,काइंड्स ऑफ़ सिंथेसिस . इसे आप पक्ष, ,प्रतिपक्ष ,तालमेल ,सामंजस्य  के सन्दर्भ में समझ सकते है ..

यदि किसी परिवार के सदस्यों   की कुंडली उपलब्ध हो तो इस तरह का तालमेल बैठाना (सिंथेसिस ) बहुत आसन हो जाता है. अब अगर ज्योतिषी इस महत्वपूर्ण तथ्य को भूल जाये की तकदीर परस्पर जुडी होती है तो वह इस सिंथेसिस को भली प्रकार से नहीं कर पायेगा .



आई. पी. सी. ( इन्फरेंसेस,पेर्सप्सन , क्लीयरटी  )

अनुमान ( इन्फरेंसेस )
टास्क के जरिये ज्योतिषी को विभिन्न अनुमान या इन्फरेंसेस ( आई )लगाने होते है जिसके आधार पैर वह फलित दे सकता है वह टास्क के द्वारा निकले गये नतीजे में से संभावित अर्थों  की पड़ताल  भी कर सकता है .इसके लिये ज्योतिषी को   हिन्दू ज्योतिष की विभिन्न तकनीकों का भली भाती इस्तेमाल करना आना चाहिये .यह कठिन प्रक्रिया है जिसके लिये शुरू मे कड़ी मेहनत    करनी पड़ती है, परन्तु अंतत यह बड़ी फायेदेमंद साबित होती है .

धुंधले अनुमानों और अस्पस्ट संभावनाओं को काट छाट कर एक ओर करने में ज्योतिषी की बुद्धिमानी और समझ भुझ ही काम आती है .इस  स्थिति में ज्योतिषी का विशद अनुभव ही सहायक होता है .इस तरह की अकलमंदी कोई किसी को सिखा नहीं सकता .यह तो खुद ही सीखिनी पड़ती है. यह व्यक्ति सापेक्ष तरिका है जिस पर मै अनेक ज्योतिषीयों और ज्योतिष के विद्यार्थियों के साथ हमेशा विचार विमर्श किया करता हूँ .


हाँ ,यह न भूलें की तकदीरें परस्पर जुडी होती है . 

बोध ( पेर्सेप्सन )
बोध अर्थात पेर्सेप्सन (पी ) किसी ज्योतिषी के व्यवसायिक जीवन की चरम स्थिति है .दो विद्वान ज्योतिष तर्क पूर्वक किसी सामान नतीजे (इन्फरेंसेस ) पर पहुचने के बावजूद सर्वथा भिन्न भविष्य वाणी दे सकते है .बोध वह प्रकाश है जो सहसा किसी पल मस्तिस्क में भासित होता है और कुंडली में किसी ग्रह स्थिति का कोई नया अर्थ दे  जाता है.बोध सम्पूर्ण जीवन के शोध और दर्शन का अंतिम निचोड़ होता है .

स्पस्टता  (क्लीयरटी)
एक कुंडली में ग्रहों के किसी योग के बारे में दो ज्योतिषियों की धारणा तथा बोध पूरी तरह से भिन्न हो सकते है .उनमे से जो जादा भाग्यशाली होगा वाही उस योग का अर्थ साफ़ साफ़ देख लेगा .

किसी ज्योतिषी में निहित ईश्वरीय वाणी ही उसे यह स्पस्ट बोध देती है . कुछ अध्यात्मिक ज्योतिषियों ( योगियों ) में यह ईश्वरीय दें इतनी विकसित होती है की वे बगैर कुंडली देखे सीधे भविष्य वाणी कर देते है.
यह वह अवस्था है जब हम ज्योतिष को दिव्य प्रकाश या परम बोध की अवस्था कह सकते है .इस बात का उल्लेख योगी कथामृत में योगानंद और के एन राव ने अपनी पुस्तक "yogis destini and wheel of time "में किया है .मैने अपने जीवन में अभी तक अपने गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी जी ( श्री रजत बोस ) जी को यह करते देखा है .

हर एक इमानदार  और सत्चरित्र ज्योतिषी अक्सर पल भर के लिये कौंधती इस दिव्य ज्योति को महसूस जरुर करता है .

यहाँ मै इस बात पर जोर देना चाहूंगा की पल भर में कौंधे इस बोध का कोई ज्योतिषीय कारण अवश्य होना चाहिये .ज्योतिषी या किसी योगी के इस बोधिसत्व को ही मै क्लीयरटी (टी ) या स्पस्ट दर्शन कहता हूँ .

(साभार :के एन राव की पुस्तक विशोंत्तरी दशा से भविष्य वाणी करना)