19 मई 2011

ज्योतिष फलादेश के सबसे आधारभुत सिद्धांत


योगी मूर्खानंद जी के साथ श्री के एन राव 
ज्योतिष फलादेश के सबसे आधारभुत  सिद्धांत :-
(महान ज्योतिष श्री के एन राव जी के अनुसार )
विशोंतरी दशा के उपयोग से संबंधित सामान्य सिद्धांत इस प्रकार है :-

१ ) दशापतियों की स्थिति का कुंडली और नवमांश कुंडली में सूक्ष्म निरिक्षण कर लेना चाहिये .



२)  यदि प्रश्न जीविका से सम्बंधित हो तो दशमांश का ,भाई बहनों से सम्बंधित हो तो द्रेश्कोन का ,सम्पति से सम्बंधित होतो चत्रुथांश का , संतान से सम्बंधित हो तो सप्तांश का और यदि माता पिता से सम्बंधित हो तो द्वादशांश किन्द्ली का निरिक्षण करना चाहिये .


३) इसके बाद कुंडलियों  में देशापति की स्थिति  देखें .सुविधा के लिये कुंडली में उसे साढे तीन ,नवांश में तीन  और सम्बंधित वर्ग  कुंडली में आधा अंक देकर तीनों कुंडली का मिर्श्रित  परिणाम देखे .


४)  प्रत्येक घटना को तीनों कुंडलियों से परखना चाहिये .


५) संबंधित वर्ग कुंडली को जन्म कुंडली तथा  नवमांश से अधिक महत्त्व कभी न दें किन्तु सम्बंधित वर्ग कुंडली को देखना भी न भूलें .



६)विशोंत्तरी में प्रत्यंतर दशा  तक अवश्य देखें .ज्यादातर मामलों में यह विधि कारगर रहती है .


७)महादशा नाथ और अन्तेर्दशा नाथ की पारस्परिक स्थिति पर गौर करें .अगर वे एक दुसरे दे केंद्र या त्रिकोण में है तो यह अच्छी स्थिति है . यदि वे परस्पर २/१२  या  ६/८ अक्ष पर है तो कुछ अड़चने या बाधाएं आ सकती है .लेकिन तुरंत इस नतीजे पर न कूद पडें की अब बर्बादी तय है .यह किसी अचम्भें या बडे परिवर्तन को भी इंगित कर सकता है .


८)दशापति किन भावों के स्वामी है और उनके कारकत्व क्या है इस पर विचार करे .


९)  अब किसी अन्य दशा  या योगिनी का प्रयोग कर सकते . योगिनी बहुत  सरल और आसन दशा है और इसमे
आप वी पी गोयल की बेहतरीन  पुस्तक" pridict effectively through yogini dasha"  से मदद  भी ले सकते है .


१०) यदि आप जैमनी की चर दशा का प्रयोग करना जानते है तो आप किसी घटना की तीन तरह से जांच कर सकते है यथा विंशोत्तरी ,योगिनी 'और चर दशा से. जैमिनी की चर दशा की के एन राव की शोध परक पुस्तक "जैमिनी चर दशा से भविष्य  वाणी  " भी उपलब्ध है .


११) इन सब बातों की चन्द्र कुंडली से भी पुष्टि कर लेनी चाहिये .


१२) सबसे  अंत में गोचर का प्रयोग करे .गोचर लगते वक्त सर्वास्टक का प्रयोग अवश्य करे .