8 मई 2011

मैने यहाँ प्रेक्टीकल साइड पर जादा जोर दिया है




"कहाँ हो डाक्टर साहब ?" मोबाइल पर फ़ोन करके अमित ने पूछा.
"मै तो उपाध्याय नगर में हूँ " मैने कहा .
"आज आप स्वामीजी के पास ध्यान केंद्र आवोगे ?" अमित ने पूछा .
" आज तो नहीं आ सकूँगा  मै "घडी में समय रात साढे दस  को देख कर मैने कहा. अमित ने ठीक है कहके  फ़ोन रख दिया  .

शनिवार को गुरुदेव के पास रात को क्लिनिक बंद करके जाना होता है .बाद में विचार किया की भले ही लेट हो पर गुरुदेव के पास जाना ही है.रात को करीब ग्यारह बजे ध्यान केंद्र पंहुचा .
गुरुदेव की सेवा शिष्य लोग कर रहे थे .


हम सभी ऊपर सत्संग हाल में आये .गुरुदेव भी आ गये .


मैने कहा "स्वामीजी जैसा  ओशो के अन्य ध्यान केन्द्रों में होता है या अन्य संतों के केन्द्रों में होता है वैसा कार्यक्रम यहाँ नहीं होता .आपने इस ध्यान केंद्र की बातचीत ,चर्चा ,एवं कार्यक्रम सभी कुछ अलग तरह से किया है ."

"हाँ . बाकि जगह जो  होता  है वो एकेड़ेमिक   होता है.  एक फिक्स प्रोग्राम है की इतने से इतने बजे तक ध्यान होगा . ध्यान का टेप  लगा दिया जाता है और सब लोग ध्यान करते है .सारी बाते  अध्यात्म की होती है .जीवन और आवश्यकता की व्यवाहरिक कोई बात नहीं होती है . सब  ज्ञान  चर्चा और औपचारिक बातें ही होती है .ऐसा ही प्रायः सभी सत्संग केन्द्रों में होता है ."
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"मैने यहाँ प्रेक्टीकल  साइड पर जादा जोर दिया है . यहाँ अकेडमिक कुछ भी नहीं है .इसलिये किसी प्रकार की बाध्यता नहीं है .मैने उन्ही चीजों को रखा है जिसका प्रेक्टिकल और अध्यात्मिक दोनों प्रकार का रोल है. अध्यात्मिक जगत की वो बातें जिनका व्यावहारिक लाभ भी है उसको ही रखा है .इसीलिये यहाँ उस प्रकार की बातें नहीं  होती है जैसे बाकि ध्यान केन्द्रों में होती है .सत्संग के विषय भी यहाँ व्यक्ति  के स्वयं के कल्याण के ही होते है ."

मैने कहा " जी स्वामीजी यहाँ जादा आनंद है .एकेडेमिक बाध्यता नहीं रहने से जादा फ्री महसूस होता है .सारी चीजे जो हम यहाँ करते है वो हमारे लाभ और आनंद की है. सत्संग  .मंत्र ,रत्न ,साबर,हवन,अंक,भोज,पिकनिक  ,सभी से हम सबका लाभ हुआ है और जीवन में सुख शांति और मजे की वृद्धि हुई है ."


 गुरुदेव ने आगे कहा "देखो जो यहाँ  खाना बनाने  का कार्यक्रम  होता है उसका भौतिक और अध्यात्मिक दोनों प्रकार का महत्व है .इस्ट और भगवान् के सामने ,सभी गुरुभाई मिलकर गुरु के निर्देश में जो भोजन बनाते हो उसका अध्यात्मिक महत्व है .सभी बडे मंदिरों में जैसे दक्षिणनेश्वर में भी माता को भोग लगता है .सारे समय जो भोजन बनता है उसको भोग ही कहते है .माँ को  भले  थोडा सा ही भोग लगता है जिसको असल भोग कहते है ,पर उसी का अंश बाकि भोग में छिड़क कर सब भोजन  को भोग बना लिया जाता है. यह भारत वर्ष के विशेषता है की यहाँ भोजन को भी भगवान् का प्रसाद बना कर खाने की दिव्य विधि है जो जीवन के इस विशिस्ट हिस्से को भी इस्ट से जोड़ देता है और सारे भोजन प्रसंग को अध्यात्मिक लाभ से भर देता है .ऐसा एक मात्र हिन्दुस्तान में ही होता है ."

 " बाकि भोग को खाने  का आनंद  तो सभी जगह है .यहाँ मसाले और  पाक विधि की  विशेषता के कारण अदभुद स्वाद आता है जिसका रस अनोखा ही होता है .यह व्यावहारिक लाभ है अध्यात्मिक के साथ ."  

 " जी गुरुदेव .ऐसा स्वाद दुर्लभ है ."सभी गुरुभाइयों ने एक स्वर में कहा.







अंत ने दो लाइन" सहज आसिकी नहीं" से 



वो तो वो है तुम्हे  हो जाएगी उल्फत मुझसे 
एक नजर तुम मिरा महबूबे -नजर तो देखो 



आज इतना ही .