6 मई 2011

मै ऐसा ही ध्यान केंद्र बनाना चाहता था




आज से बारह साल पहले जब गुरदेव के यहाँ ध्यान केंद्र में सबसे पहली बार जब मै  आया था तब सत्संग  में मणि भाई जी, गोविन्द राम  जी, ताम्बू (जितेंद्र उपाध्याय ),दीपक , की मण्डली में  खूब चर्चा होती थी . जीवन के सभी आयामों की चर्चा होती थी ,मज़ा मस्ती का अगाध दौर चलता रहता था  .गुरुदेव इन सभी के सूत्रधार के रूप में रहते थे और यह हमेशा ध्यान रखते थे की संत्संग में भाग लेने वालों की चेतना में  सुधार हो .यद्यपि उनकी प्राविधि  एकदम अनूठी और गोप्य होती थी .
तब भगवान श्री रजनीश की  , उनके ध्यान प्रयोग की , पूना और अन्यत्र ध्यान केंद्र की चर्चा होती थी .
यह एक दौर था .इसमे कभी कभी अन्य लोग भी आ जाते थे . सभी को इस दौर के अद्भुत आनंद का स्वाद मिला है. स्मृतियों में ,अंतर आत्मा में भी यह बसा हुआ है .

इसके दो तीन साल बाद गुरुदेव ने मुझे ज्योतिष के प्रारंभिक पाठ सिखा दिये . शुरू में थोडा उत्साह मैने दिखाया पर ज्योतिष के माध्यम से आस पास के लोगों की पत्रिका की जांच किताबों के अनुसार करने का प्रयास भी किया .
इस प्रयास  मुझे धक्का लगा . भावनात्मक रूप से जुडे लोगों की जीवन की बातें किताब के अनुसार इतनी नाकारात्मक लगती थी की दिल ही बैठ जाता था .तो जल्दी ही मेरा उत्साह ठंडा पड़ गया .
पर गुरुदेव लगातार मेरी उपस्थिति में ज्योतिष की चर्चा करते और मुझे बारीकियां बताते  भी .प्रारंभिक ज्योतिष की बातों को समझाते, लग्नों के अनुसार व्यक्ति की विशेषता बताते ,कई प्रकार की घटना का ज्योतिष के अनुसार विश्लेषण करते. जब भी कोई पत्रिका आती तो मुझे भी दीखाते और जातक को अपनी भविष्य वाणी और विवेचन से मन्त्र मुग्ध करते .ऐसे समय में मै ज्योतिष के रहस्यों को समझाने की कोशिश करता पर पकड़ में कुछ नहीं आता .जिज्ञासा उठ जाती और फिर मै कुछ पड़ लेता ,किताबों में दिमाग खपाता.और गुरुदेव से प्रशन पूछता .इस प्रकार दो तीन साल और बीत गये .इस दौरान गुरुदेव  हमारे बीच के लोगों की भिन्नताओं और खासियत की पत्रिका के अनुसार विवेचना करते रहते .कई बार कुछ पल्ले नहीं पड़ता तो कई बार थोड़ा समझ आता .गुरुदेव ने ज्योतिष की चर्चा को लगातार सत्संग में बनाये रखा .मेरे मन और  बुद्धि में प्रभाव पड़ते रहता .बीच बीच में किताबों को मै पढने समझने  की कोशिश करता .
फिर मैने पत्रिका बांचना शुरू किया तो घोर असफलता हाथ लगी .इसमे भी गुरुदेव ने उत्साह मेरा बनाये रखा .मेरी गलतियों को सुधार किया .प्रेम से मेरे अन्दर की ज्योतिष की आग की जिलाये रखा .
ज्योतिष और विवेचना के बाद उपाय जो जीवन में फर्क लाये उसकी बातें होने लगी . कुछ लोगों को फर्क दिखने लगा .
उपाय के रूप  गुरुदेव ने हमारे अंदर मंत्रजाप के बीज बो दिये .हम सभी गुरुभाई मंत्रजाप नियमित करने लगे .कई प्रकार के अवसरों और समस्याओं के निराकरण के लिये भी मन्त्र गुरुदेव ने बताये जिसको करके हम सभी को लाभ हुआ .

.इसके बाद रत्नों की बात निकली तो गुरुदेव ने अपने ज्योतिष विज्ञानं के अनुभव और सिद्धों के बताय हुवे ज्ञान के अनुसार हमे उपरत्न का ज्ञान दिया .सभी गुरुभाइयों ने इसे धारण कर लाभ लिया और इस प्रकार मेरे सामने उपरत्न की महिमा साक्षात् हुई .
आगे गुरुदेव ने अंक ज्योतिष के बाबत भी बताया जिसका प्रमाण मुझे मिला . सभी गुरुभाइयों के  हस्ताक्षर और नाम  के अंगरेजी के फॉण्ट को बदल कर असर देखा .

आगे मैने जब रुद्राक्ष की बात की तो गुरुदेव ने कहा की और क्या तू जानेगा .तब मैने गुरुदेव से कहा की किताबों में इसकी बड़ी महिमा लिखी है ,मै जानना चाहता हूँ की क्या ये वाकई में असर कारक है .तब गुरुदेव ने
ने मुझे रुद्राक्ष के उपयोग और प्रयोग की जानकारी दी .सभी गुरुभाइयों ने भी इसे धारण किया और लाभ प्राप्त किया .इसका असर  भी मेरे सामने प्रमाणित हुआ .

आगे मैने और पुस्तक पढकर हवन की गायत्री विधि सिखी और मेरे एक गुरुभाई और खुद के घर पर किया भी .इसे सुनकर गुरुदेव ने गायत्री हवन का एक कार्यक्रम ध्यान केंद्र में भी कराया .इसमे उन्होने अपने घर के सदस्यों को भी बुलाया और मुझे इस के लिये दक्षिणा भी दी .ऐसा करके उन्होने मुझे उत्साहित किया और फिर उन्होने हवन करने की सरल और प्रमाणिक विधि जो उन्होने अपने गुरूमा से परंपरा के अनुसार सिखी थी उसे बताई .इसके बाद तो हम सभी गुरुभाई मिलकर सभी पवित्र अवसरों पर हवन करने लगे .
हवन की साड़ी क्रियाविधि मुझको गुरुदेव ने बताई और लगातार प्रोत्साहित करने लगे .जो जो भी कमिया थी उसको गुरुदेव ने सुधारा.
सभी को हवन में मज़ा आने लगा .हवन की सारी सामग्री को संगृहीत करके उसका भंडार बना लिया गया .सब गुरुभाइयों का सहयोग और प्रेरणा से हवन हर अवसर पर होने लगा .
गुरुदेव ने कुछ मन्त्रों को सिद्ध करने के लिये मुझे  , गप्पू और हेमंत को कहा .हमने इसे उत्साह से किया .सिद्ध करने की प्रक्रिया में हवन शामिल था .तो इस कारण से ध्यान केंद्र में हवन होते ही रहा .सिद्ध मन्त्रों का प्रयोग करके भी देखा गया .सबके सामने इसका पूरा परिणाम प्राप्त हुआ .मेरे मन मस्तिस्क में एक पूरी नयी और परंपरा के प्रति आस्थावान विचारधारा का उदय हो गया .

अब  ध्यान केंद्र  में ओशो के सामान्य शिष्यों वाली तार्किकता और परंपरा के प्रति विद्रोह की बात हटकर प्राचीन गुरुकुल के जैसा वातावरण बन गया .
एक दिन गुरुदेव ने कहा की मुझे शक्ति, अघोर  ,और ज्योतिष परंपरा के बातों का   सारा मार्ग दर्शन भगवान् श्री रजनीश (ओशो ) ने ही किया .

हवन करते देख  कर गुरुदेव ने कहा " मै ऐसा ही ध्यान केंद्र बनाना चाहता  था जहाँ ऐसा हवन हो .तुम लोगों को यह करते देख कर मुझे बहुत प्रसन्नता होती है . मन्त्र जाप और सारी पूजा विधि धार्मिक क्रिया कलाप है जबकि हवन सिद्धि का अनुष्ठान है .हवन बहुत ही  जादा शक्तिशाली विधि है फल प्राप्ति की. इससे साधक को  बहुत शक्ति मिलती है .मनोकामना पूर्ति के लिये भी यही विधि है ."

अन्य अवसर पर गुरुदेव ने कहा " तुम लोगों के मन में इन चीजों के प्रति श्रद्दा हो इसके लिये मैने बहुत धीरे धीरे मन्त्र ,उपरत्न ,ज्योतिष , शाबर ,हवन की बातों को तुम्हारे मन और मस्तिस्क में डाला .यह गुरु की बहुत सूक्ष्म क्रिया विधि है .इसके लिए बहुत समय लगता है .यही सदगुरु का कार्य है ."