10 मई 2011

विक्टोरिया मेमोरिअल में बोस एंड कम्पनी द्वारा लगाई गयी काले फर्शी पत्थर की टाइल्स

उन  प्यारे  हाथों  को  चुमों
                        जो  कालचक्र  के  काले   परदे
रंग भूमि   से उठा  रहे  है
                        युगारंभ  के   प्रखर  सूर्य    को
नूतन देह  में  उगा  रहे  है

उन प्यारे हाथों को चुमों ..........................................





श्री रजत बोस जी का जन्म 28 नवेम्बर 1943 को 6 : 18 मिनट सायंकाल    पर रायपुर में हुआ .इनके पिता जी श्री सुधीर कुमार बोस और माताजी श्रीमती उमा बोस थी .


श्री सुधीर कुमार बोस (आचार्य जी )





इनके पिता जी का जन्म रायपुर में ही हुआ . श्री सुधीर कुमार बोस अपने पिता जी की द्वितीय संतान थे .प्रारम्भिक शिक्षा रायपुर में होने के बाद पिता जी ने इन्हे कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में भर्ती करा दिया .युवा सुधीर कुमार का  शारीरिक गठन बहुत मजबूत था और वो नियमित आखाडे में अपनी शारीरिक साधना भी करते थे .कलकत्ता में भी उन्होने अखाडा ज्वाइन किया .ये हाकी के भी बहुत अच्छे खिलाडी थे .इनका प्रिय स्थान हाकी में गोल कीपिंग था जिसमे उस समय शारीरिक मजबूती की बहुत जरुरत होती थी .इनका भारतीय नेशनल टीम में भी सेलेक्सन हो गया था पर टीम के कप्तान से विवाद के कारण टीम में इन्हे नही लिया गया .कलकत्ता में इनके पिता जी ने खुद का  मकान काफी हाउस रोड में  लिया था . 



 यही पढाई  के दौरान  इनका सम्पर्क क्रांतिकारियों से हुआ और ये स्वतंत्रता संग्राम में कूद गये .इनको इस कारण  पढाई छोडनी पड़ी.  इनको गुप्त कार्य दिया गया जो ये रायपुर में रहकर किया करते थे .स्वंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण इनको कई बार जेल भी जाना पड़ा

रायपुर के कालीबाड़ी के तत्कालीन समय में सुधीर कुमार बोस जी प्रमुख कार्यकर्ता थे .और विभिन्न सांस्कृतिक और नाट्य प्रोग्राम भी किया करते थे .

आजादी के पहले से ही इनका संपर्क आर एस एस के प्रमुख श्री गुरूजी से हुआ और ये उसके छत्तीस गढ़  के प्रुमुख कार्यकता बन गये .इसी संगठन के कारण 1943 और 1977 में इन्हे जेल भी जाना पड़ा . इन्होने कुछ समय तक कालीबाड़ी स्कूल में अंग्रजी अध्यापन का कार्य भी किया .

1974 में इन्होने शिशु शिक्षा केंद्र की स्थापना बूढा पारा रायपुर में की और अंत तक शिक्षा के इस मिशन से   जुडे रहे .

सुधीर कुमार बोस जी का अध्यात्मिक रुझान शुरू से था और इनको इस सन्दर्भ में बहुत ख्यातिनाम धन्य गुरुओं के मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ .इनमे परम पूज्यनीय श्री गुरूजी (आर एस एस  प्रमुख ) श्री हरिहरानंद  जी
( क्रिया योग ) यति महाराज (रास बिहारी  बोस के साथी )स्वामी बुधानंद जी (भारत सेवाश्रम संघ ), रानाडे जी इत्यादि प्रमुख थे . रायपुर में तत्कालीन अध्यात्मिक वातावरण में कई लोग इनसे मार्गदर्शन लेने भी आते रहते थे .यद्यपि अंत में अपने सुपुत्र श्री रजत बोस की पात्रता को जानकर इनसे इन्होने दीक्षा ली .यह इनकी अध्यात्मिक और व्यकिगत विशेषता का ही उदहारण है .

इनकी मृत्यु  रायपुर में ही १९९५ ने हुई .मृत्यु के पूर्व  तक इनको  संज्ञा थी  और अंत में इन्होने अपने शरीर त्यागने का इशारा श्री रजत बोस अपने पुत्र को करके समाधी में लीं हो गये .गुरुदेव ने इस संधर्भ में बताया की ब्रम्ह योग में जन्म लेने और अध्यात्मिक साधना के कारण श्री सुधीर कुमार बोस जी का जीवन अध्यात्मिक था और इसी कारण अंत में इनकी सदगति हुई .

श्री शरत चन्द्र बोस 

सुधीर कुमार बोस जी के पिता श्री शरत  चन्द्र बोस था  इनका जन कलकत्ता में हुआ और प्रारंभिक शिक्षा कलकत्ता में हुई .बाद में ये किसी कारण से अपनी आजीविका कमाने के लिए छत्तीस घड़ के रायगड में आ पहुंचे .यहाँ के अंग्रेज ठेके दार ने इनकी प्रतिभा देख कर इनको बहुत काम दिया .इसके बाद शरत चन्द्र रायपुर में बुढा पारा में बस गये और यहाँ के सबसे बडे कानट्रक्टटर बन गये. इनके द्वारा किये गये प्रमुख कार्यों में रायपुर की राजकुमार कॉलेज की बिल्डिंग और कलकत्ता के विक्टोरिया मेमोरिअल में बोस एंड कम्पनी द्वारा लगाई गयी काले फर्शी पत्थर की टाइल्स है  .इन्होने रायपुर  में कई  उद्यम स्थापित किये और रायपुर पूरी और कलकत्ता में संपत्तियां बनाई.
अंत में इन्होने अध्यात्मिक आश्रय लिया और पूरी में अपनी साधना की . इनका देहांत  1936   में हुआ .



श्री रजत बोस जी एवं उनके सुपुत्र श्री अनुराग बोस जी 

वर्त्तमान में श्री रजत कुमार बोस जी अपने बुढा पारा के मकान में अपने सुपुत्र श्री अनुराग बोस जी के साथ सपरिवार रहते है .
ओशो (भगवान् श्री रजनीश ) से दीक्षा लेते हुवे श्री रजत बोस (स्वामी चिन्मय योगी )

श्री रजत बोस जी ने  13 जनवरी 1979 में भगवान् श्री रजनीश( ओशो ) से संन्यास लिया और इनका सन्यास नाम स्वामी चिन्मय योगी भगवान् श्री ( ओशो )ने रखा. इसी समय ओशो ने इन्हे नीरव रजनीश ध्यान केंद्र नाम रखकर एक केंद्र चलाने के लिये कहा .इसी मकान के द्वितीय तल पर 1979 से नीरव रजनीश ध्यान केंद्र संचालित हो रहा है .


"मैंने  उनको  जब जब   देखा 
सोना  देखा 
सोना जैसा तपते देखा ,गलते देखा 
ढलते देखा 
मैने उसको गोली सा चलते देखा   "



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें