31 मई 2011

सम्बुद्ध स्वामी आनंद निर्वाण (यथार्थ ) (जीतेंद्र उपाध्याय ) जी के जीवन के अमूल्य स्वानुभव की झलकियाँ




सम्बुद्ध स्वामी आनंद निर्वाण (यथार्थ ) (जीतेंद्र उपाध्याय  ) जी के जीवन के अमूल्य स्वानुभव की झलकियाँ 
जीतेंद्र उपाध्याय (स्वामी आनंद निर्वाण यथार्थ )






वर्तमान सत्संग के लिये पता है :
जीतेंद्र उपाध्याय 
9300137696
पेंशन बाड़ा चौक 
रायपुर .
(अध्यात्म ,ओशो ,झेन,ध्यान ,सत्संग के अनूठी विधियों के स्वानुभव के लिये उपरोक्त पते और नंबर पर संपर्क कर सकते है )


जीतेंद्र उपाध्याय जी को गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी ( श्री रजत बोस ) ने ओशो संन्यास दीक्षा ने स्वामी आनंद निर्वाण नाम प्रदान किया  था .जीतेंद्र उपाध्याय जी ने अपने जीवन के युवा काल के आठ अमूल्य वर्ष गुरुदेव के साथ गहन सत्संग में बिताये है .
जीतेंद्र उपाध्याय (स्वामी आनंद निर्वाण यथार्थ )

 करीब उन्नीस साल  से जीतेंद्र  अध्यात्म  और सत्संग में  गहरी डुबकी लगा रहे है .



उन्होने अपने विशिस्ट अनुभव को अपनी डायरी में लिखा है जिसको २९ मई २०११ रविवार सत्संग में सबके सामने सबसे पहली बार प्रकाशित किया और गुरुदेव के समक्ष स्वयं पढकर सुनाया .

उनके डायरी के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत है :


आदमी  की  नियत को 
ठीक ठीक समझना
सबसे कठिन काम है 
स्वामी आनंद निर्वाण यथार्थ  




मेरे पास किसी को देने के लिये कुछ नहीं है
और मुझे अब किसी से कुछ लेना नहीं है
मेरे पास जो कुछ भी है वो अस्तित्व का
दिया हुआ है  उसमे मेरा कुछ हाथ नहीं

स्वामी आनंद निर्वाण ५-४-७   प्रातः  २:१५





जीवन उपहार में मिला सभी को
जीवन पच नहीं रहा किसी को
सब बौखलाये बौखलाये फिर रहे यहाँ
जीवन समझ आरहा नहीं किसी को
आनंद निर्वाण









लिखना मेरा     शौक नहीं
दिखना मेरी मौज    नहीं
लूटना उसका   भ्रम सही
लुटता मै       कभी   नहीं
इन्द्रियों से मै दिखता कभी नहीं

स्वामी आनंद निर्वाण

भूख ,  प्यास,   ठंडी ,  गर्मी
मन में उबल ,घुटन बेचैनी
उत्साह, हताशा , लालच ,झिझक
घबडाना, शरमाना,शारीरिक पीड़ा
थकान ,           सब कुछ दर्पण में
दिखता है फिर भी दर्पण मौन रहता है

स्वामी आनंद निर्वाण


स्वामी आनंद निर्वाण यथार्थ ( जीतेंद्र उपाध्याय )








उसकी परंपरा : करुणा सदगुरु की

मैने कह के कुछ कहा नहीं
उसने सुना सब कुछ सही सही   .         ( अव्याख्य )

मैने जान जान के जाना नहीं
उसने छोड़ा सब   सही   सही .

मैने      खोजा   सब    जगह
उसने खोजा    कही     नहीं .

मै     अब      रहा     नहीं
समझ  गया  वह  सही सही .

आनंद निर्वाण  १२-३-२००७












 हर शोरगुल की   ओट में मौन     छुपा    है
और मौन हर शोरगुल से अनंत गुना बड़ा है
जैसे एक तारे से आकाश अनंत गुना बड़ा है

आनंद निर्वाण







 कोई खोज रहा था बरसों से
जिसे वह खोज रहा था वह वही है
जिसे वह खोज रहा था

स्वामी आनंद निर्वाण  २५-७-२००७ रात्रि ८:२२



जीतेंद्र उपाध्याय 



 निज घट जानू मै

जो भी व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति को
समग्रता से अभिव्यक्त कर लेता है वह
जीवन के महारास  को प्राप्त हो जाता है

आनंद निर्वाण
जीतेंद्र उपाध्याय (स्वामी आनंद निर्वाण यथार्थ )






                                    करिश्मा उसे कहते है 
                            जो कभी दोहराया नहीं जायेगा 


                                               यथार्थ 
                                                                      रात्रि १२:१५


जीतेंद्र उपाध्याय (स्वामी आनंद निर्वाण यथार्थ )






                                  "  ये जीवन इतना सीरियस भी नहीं है की
                                   इसके लिये इतना परेशान हुआ  जाये "
                            स्वामी आनंद निर्वाण यथार्थ (जीतेंद्र उपाध्याय )







30 मई 2011

श्रद्धा से आप रीसेप्टीव बन जाते हो

तेज     है    आज   दर्दे- दिल        साकी
तल्खी -ए- मय  को   तेजतर   कर     दे .

२९ मई २०११ 
रविवार सत्संग 
आज जीतेंद्र उपाध्याय ,सूरज ,पिंकू ,गप्पू ,हेमंत ,बाबा और उसके दोस्त ,अनिल आये हुवे है .गुरुदेव के साथ वार्तालाप चल रहा है .
स्वामी आनंद चैतन्य (डाक्टर सत्यजीत ) जीतेंद्र और हेमंत 

आज जीतेंद्र उपाध्याय अपनी साधना और उपलब्धिओं के प्रतिक को लिख कर रखने वाली अपनी बोध वाणी  की डायरी ले कर आया है .


उसने सबको अपनी बोध चिंतन से भरी वाणी को अपने अंदाज में सुनाया .उसका कहना है की अपने उनीस साल के आध्यात्म की खोज से उसको ये निष्कर्ष प्राप्त हुवा है .

जीतेंद्र उपाध्याय 

अनिल अपनी रोचक बातों से गुरुदेव और सभी गुरुभाइयों का मनोरंजन कर रहा है .जिसको जिसको  जिस बातों में रूचि है उसका आस्वादन कर रहे है .

गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी ( श्री रजत बोस )एवं जीतेंद्र 

गुरुदेव बार बार सत्संग हाल की लाइट और स्विच को बंद करने की नसीहत भी बीच बीच में दे रहे है क्यूंकि गुरुभाइयों और मेरी आदत है की लाइट और स्विच चालू रखने की .गुरुदेव बिजली के बिल खुद भरने की बात बोलकर सबको यह अच्छी आदत डाल रहे है. उनका कहना है की वो आपना ए सी भी बहुत कम समय के लिये चलाते है और बाकि समय कूलर से काम चलाते है .


हेमंत सबकी बातों का मजा ले रहे है .
बाबा के दोस्त अपनी अंगुठी की प्राण प्रतिस्ठा गुरुदेव से करवा कर धारण कर लिया .
बाबा नये है इसलिये सबकी बातों का मज़ा ले रहे है .
आज भी सूरज ने भोजन बनाने का जिम्मा लेकर सारा कम बहुत ही सलीके से कर लिया है .
सामूहिक भोजन का आनंद 
अनुराग भैया भी आकर हमारी बातचीत में सम्मिलित हो गये है .
आज गुरुदेव से       ज्योतिष के प्रसंग पर चर्चा चली तो उन्होने कहा   " तुम लोग हवन को सदैव जारी रखना.फल प्राप्ति के लिये इससे बड़ा और कोई तरीका नहीं है .

रत्न मंत्र और गुरु इस्ट के प्रर्ति समर्पण से ही काम बनता है .ज्योतिष की उपयोगिता मात्र इतनी है की आप को यह सब करने के लिये प्रेरित  करता है. 

दिव्य सत्संग 
ज्योतिष के सभी आयामों को देख कर जटिलताएं बढ़ाने का व्यावहारिक उपयोग कुछ नहीं है .

ज्योतिष का सार यह है की आप लग्नेश ,पंचमेश ,और भाग्येश का रत्न धारण कर उसका मन्त्र जाप करते रहो .
पत्रिका की विसोंत्तरी दशा के लग्नेश पंचमेश और भाग्येश की दशा को टिक कर दो की यह आपके लिये अनुकूल समय होगा और बाकि अकारक ग्रह की दशा प्रतिकूल समय को बतायेंगी .

आप उपाय  को करो तो बहुत सारी बाधा अनजाने में है कट जाएँगी .
सही जगह दान करने से भी आपकी बहुत सारी खर्च होनी की संभावना कम हो जाएगी .

यहाँ तुम लोग इतनी समय से यह सब उपाय  कर रहे हो ,तो तुम ही विश्लेषण करो की यह सब नहीं करते थे तब और अब में तुमको अपने जीवन में क्या फर्क पड़ा है ?

मेरे ख्याल से सभी को फाएदा ही हुवा है .अनजानी बाधाओं से तुमको जो बचाव हुवा है उसका तो कोई प्रमाण नहीं दे सकता पर अपने लाभ हानी की प्रतीति तो स्वयं तुमको पता चलती ही है .

 गुरुदेव के साथ पिंकू ,गप्पू जीतेंद्र और सत्तू 
गुरु शिष्य संबंधों  पर चर्चा में   गुरुदेव ने कहा " अगर आपको गुरु पर  शक हो रहा है तो तुमने गुरु वस्तुतः बनाया ही नहीं .जब सदगुरु के शरण में आये हो और शक कर रहे हो तो तुम अपने ऊपर सदगुरु के आशीष की वर्षा को रोक देते हो .इसका मतलब तुम्हारा अभी शिष्य बनाने का कार्य नहीं हुवा है .
श्रद्धा से क्या फर्क पड़ता है . श्रद्धा से आप रीसेप्टीव बन जाते हो .  श्रद्धा से मन्त्र जाप करो ,पूजा हवन करो ,गुरुभक्ति करो तो श्रद्धा आपकी मन स्थिति और शरीर की नाडियों में ऐसा परिवर्तन कर देते है की आप उच्चतर शक्तियों की ऊर्जा को अपने अन्दर समाहित कर सकते हो .यही ऊर्जा आपके अंदर रूपांतरण कर देता है और आपका जीवन पहले की अपेक्षा जादा भाग्यशाली हो जाता है ."
अमित आज नहीं आया है .उसके नौकरी और मन स्थिति के बाबत भी सब लोग चर्चा कर रहे है .लगातार आने वाले अमित के नहीं  आने  से यह स्वाभाविक ही है .उसने फ़ोन पर कहा है की उसके डीपो में जरुरी काम के कारन वह वहीँ फंसा हुवा है. आइसक्रीम कंपनी में गर्मी का समय सीजन का समय होता है .

फैज    तकमीले   आरजू     मालूम 
हो सके   तो यूँ   ही  बसर  कर     दे 











   

28 मई 2011

Sri Yukteswar about AstrologyAn extract from 'Autobiography of a Yogi' by Paramahansa Yogananda, 1946 original edition

Sri Yukteswar about Astrology


(An extract from 'Autobiography of a Yogi' by Paramahansa Yogananda, 1946 original edition. Here Yogananda narrates his conversation with Sri Yukteswar on the topic of astrology)



"Mukunda, why don't you get an astrological armlet?"



"Should I, Master? I dont believe in astrology."



"It is never a question of belief; the only scientific attitude one can take on any subject is whether it is true. The law of gravitation worked as efficiently before Newton as after him. The cosmos would be faily chaotic if its laws could not operate without the sanction of human belief.



"All parts of creation are linked together and interchange their influence. The balanced rhythm of the universe is mooted in reciprocity," my guru continued. "Man, in his human aspect, has to combat two sets of forces - first, the tumults within his being, caused by the admixture of earth, water, fire, air and ethereal elements; second, the outer disintegrating powers of nature. So long as man struggles with his mortality, he is affected by the myriad mutations of heaven and earth.



"Astrology is the study of man's response to planetary stimuli. The stars have no conscious benevolence or animosity; they merely send forth positive and negative radiations. Of themselves, these do not help or harm humanity, but offer a lawful channel for the outward operation of cause-effect equillibriums which each man has set into motion in the past.



"A child is born on that day and at that hour when the celestial rays are in mathematical harmony with his individual karma. His horoscope is a challenging portrait, revealing his unalterable past and its probable future results. But the natal charts can be rightly interpreted only by men of intuitive wisdom: these are few.



"The message boldly blazoned across the heavens at the moment of birth is not meant to emphasize fate - the result of past good and evil - but to arouse man's will to escape from his universal thralldom. What he has done, he can undo. None other than himself was the instigator of the causes of whatever effects are now prevalent in his life. He can overcome any limitation, because he created it by his own actions in the first place, and because he has spiritual resources which are not subject to planetary pressure.



"Superstitions awe of astrology makes one an automation, slavishly dependent on mechanical guidance. The wise man defeats his planets - which is to say, his past - by transferring his allegiance from the creation to the Creator. The more he realizes his unity with Spirit, the less he can be dominated by matter. The soul is ever-free, it is deathless because birthless. It cannot be regimented by stars.



"Man is a soul, and has a body. When he properly places his sense of identity, he leaves behind all compulsive pattterns. So long as he remains confused in his ordinary state of spiritual amnesia, he will know the subtle fetters of environmental law.



"God is harmony, the devotee who attunes himself will never perform any action amiss. His activities will be correctly and naturally timed to accord with astrological law. After deep prayer and meditation he is in touch with his divine consciousness; there is no greater power than that inward protection."



27 मई 2011

धोनी की किस्मत की चकरी चल रही है


NRMC DIARY 24:05:11 10:45 PM

आई पी एल का  २४ मई का मैच सब लोग देख रहे है .पिंकू धोनी की टीम को जिताने के लिये बैठा हुआ है .बाकि लोग आर सी बी को जिताने के लिये सोच रहे है .वैसे भी आर से बी ने  शानदार १७५ रन बनाये है जो  पीछा करना बहुत मुश्किल है .
पिंकू को सब बोल रहे है की अब तो हालत धोनी की टीम की पतली है .लगातार रन रेट बढ़ रहा है .शुरू के दो विकेट जल्दी गिर गये है .
बद्रीनाथ आउट हो गया .धोनी ने कुछ करारे शाट लगाये पर वो भी चलता बना .
पिंकू के  ऊपर  दोस्त और ध्यान केंद्र का  भी प्रेशर और बढ गया .बाहर के दोस्त एस एम् एस पर भी उसको बता रहे है की तेरी टीम हर जायेगी उसकी हालत पतली है .


रैना बढ़िया खेल दिखा रहा है साथ में अल्बी मोर्कल ने खूब जोरदार खेल दिखा कर टीम जो आखिरकार जीत दिला ही दी .
पिंकू इस जीत से उछल पड़ा और कहा " धोनी की किस्मत की चकरी चल रही है ,इस चकरी में जो भी दांव लगायेगा वो जीतेगा ही ."
अनुराग भइया ने कहा " धोनी की किस्मत वाकई बहुत ही  अच्छी  है .उसको हमेशा बहुत अच्छी टीम मिलती है .वह खुद तो नहीं खेला है पर उसकी टीम उसको जीता देती है "
मैने कहा " धोनी तो आल टाइम ग्रेट प्लेयर बन गया है वर्ल्ड कप जीता कर .वर्ल्ड कप जितना बहुत ही कठिन बात है और देश को यह गौरव दिलवाने के कारण ही वो महान क्रिकेटर की श्रेणी में आ गया है ."


गुरुदेव ने भी कहा " वर्ल्ड कप देश के लिये होता है इसको जीतने के लिये बहुत ही अच्छी टीम ,शानदार प्रदर्शन के साथ बेहद अच्छी किस्मत का होना भी जरुरी है ."
अनुराग भैया  " धोनी का तो पांच साल कप्तान बने रहना तय है ."
गुरुदेव ने कहा " क्यों नहीं ,आखिर वो टीम को जीता ही तो रहा है .वो तो कप्तान रहना ही चाहिये ."
गप्पू भइया ने कहा " गांगुली ने अच्छे अच्छे खिलाडी को लाकर टीम की बुनियाद रख दी थी ."
अनुराग भइया ने कहा "गांगुली ने टीम को खडा किया था "

गुरुदेव " टीम इंडिया नाम ही गांगुली ने रखा था .उसने भी महान कप्तान में अपना नाम कर लिया है .टीम को झुझारू  बनाया ही उसने "
अनुराग " फसल गांगुली ने बोई और धोनी ने उसको काटा. बस फ़ाइनल ने खेल कर जीता दिया  "
पिंकू " कई कई परियां तो धोनी ने बहुत शानदार खेली .फ़ाइनल की पारी और उसका  अंतिम शाट तो यादगार है "


मैच की बात ख़त्म हुई तो गप्पू ने अपने पारिवारिक दौरे की बातें गुरुदेव को बताई .

उसके बाद गुरुदेव के साथ अन्य विषयों पर बातें होने लगी .

मैने कहा " स्वामी जी हसन भाई के  घर के निर्माण में बाधा आ रही थी उस घर को मै  और  हेमंत बांधने गये थे .तीन दिन के भीतर ही उस घर का लेन्टर्न ढल गया और ख़ुशी ख़ुशी हसन भाई यह बताने आये थे .उन्होने कृतज्ञ होकर  आभार भी प्रकट किया ." साथ में मैने हेमंत के अनुभव की बात बताई की प्रचंड भैरव मिश्रण का चमत्कारिक फल मिला .

साबर दंड 

गुरुदेव ने कहा " तुम लोगों को सबर की सिद्दीहो गयी है .जैसा अनुभव तुम लोग बताते हो उससे मुझे ओअता चल गया है .मै तो भैरवी को बोला करता था की यह लोग नहीं कर पायेंगे .पर भैरवी लगातार बोलती थी की तुम्हारे शिष्य जादा पढे लिखे है उनसे बिलकुल होगा ."
"मैने तुम लोगों को ठीक विधि से शुरू करा कर आगे की प्रक्रिया  नियम से कराई.तुम लोगों ने अच्छे  से किया भी .वस्तुतः साबर गाँव खेड़े के लोगों के लिये है जिनके पास खूब सारा समय है और धुन है की यह सब करना है .शिव जी ने अपने नंदी भृंगी लोगों के लिये इस साबर तंत्र की रचना  की थी . "
गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी जी के साथ डॉ सत्यजीत साहू और बाब पत्रे 
मै तुम लोगों को बार बार बोलता  हूँ की इसका फल बहुत ही असरदार है .कई मामलों में तो यह अघोर  से जल्दी  फल देता है अघोर में बहुत समय लगता है ."
तुम लोगो समय कितना देते हो इस पर ही है .यह तो तुम लोग लगातार कर रहे हो .भैरवी ने कहा है की समय देने पर  तुम लोगों की सिद्धि और और बढती जाएगी ."




अंत में गुरुदेव की पसंदीदा कविता. भगवान्  श्री से दूर रहकर यानि रायपुर में रहकर   उनको याद करते हुवे यह कविता उनके ह्रदय को बहुत छूती  थी .  कई बार गुरुदेव ने अपने संस्मरण में इसका उल्लेख किया है .
भगवान् श्री रजनीश (ओशो )


आचल थाम लिया है तुमने 
इतना ही आधार बहुत है 
नेह  नजर से देख रहे हो 
इतना ही आभार बहुत है 
चाहे दुरी पर जलता हो 
दीप रूप का जलता तो है 
जिसे देख कर दुर्गम पथ पर 
स्वास-पथिक यह चलता तो है 
मेरी राहे चमकने को 
इतना ही उजियार बहुत है 
किसी सगे को तरस रहा था 
मेरा एकाकी पन कबसे 
सारा जग अपना लगता है 
तुम आये जीवन में जब से 
तुम मेरे कोई अपने हो 
इतना ही अधिकार बहुत है 
भींगे रहते अधर हंसी से 
महका करता मन का उपवन 
चहका करता प्राण पपीहा 
बरसा करता सुधि का सावन 
सारी उम्र  हरी रखने को 
इतनी ही रसधार बहुत है 
बडभागी मेरा मन कितना 
जन्मों का वरदान मिला है 
गाने को मृदु गान मिला है 
पूजने को भगवान्  मिला है
कर चुका न पावूं उम्र  भर   
इतना ही यह प्यार बहुत है

(जगत तरैया भोर की प्रवचनमाला से )
संन्यास माला 




भगवान् श्री रजनीश ( ओशो )

24 मई 2011

गुरुशिष्य परंपरा में लोकतान्त्रिक व्यवस्था


की मैं  एक बार  फिर  रंगीनियों में गर्क हो जाऊं 
मेरी हस्ती को तेरी एक नज़र आगोश में ले ले 
गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी 








गुरुदेव का आचरण मित्रवत ही है. वो कभी किसी को आज्ञा नहीं देते है .हम सभी को उनकी उपस्थिति में सभी प्रकार की बातें बोलने और जैसे मन चाहे बैठने की अनुमति  है . हम सभी उनसे मित्रों की भांति ही खुलकर  व्यवहार करते है . गुरुदेव से जब यह पूछा गया तो उन्होने इस बाबत बताया  " ओशो ने कहा था की मै अगली बार मौक़ा लगे तो अपने शिष्यों के साथ दोस्त बनकर मिलूंगा और बैठूंगा .मैने यहाँ गुरुशिष्य परंपरा में लोकतान्त्रिक व्यवस्था लायी है .पहले की वयवस्था में तानाशाही थी की गुरु एक प्रकार के शासक के रोल में होता था और आज्ञा पालन के आड़ में शिष्य अपने तरफ से दोहरा व्यव्हार करने लगता था .सारा कार्यक्रम स्वतंत्र ने होकर अकादमिक रुपरेखा का हो जाता था .इसी व्यवस्था की भगवान् श्री ने बहुत आलोचना की है और मुझे भगवान्  श्री के और मैत्री जी के कुशल मार्ग दर्शन में मित्रवत आचरण की देशना मिली है .वैसे भी तुम लोगों के साथ मित्र वत रहना जो मेरे बेटे के उम्र के है बाकि लोगों के लिये असंभव ही है ."
भगवान् श्री रजनीश 



"गुरुदेव के साथ मित्रवत होने से हमारे कल्याण के लिये उनकी आज्ञाएँ क्या है यह हम शिष्य कैसे जान पाएंगे?"
इस विषय पर गुरुदेव ने कहा " देखो कल्याण मित्र गुरु तुमको आदेश की भांति कभी भी आज्ञा नहीं देगा .पर वह यदि तुम्हे कहे की ऐसा होता तो अच्छा होता तो जानना की वह तुम्हे हित में है .यही उसकी कल्याणकारी आज्ञा का स्वरुप है .कल्याण मित्र सदगुरु की सलाह ही उसकी आज्ञा होती है ."

भगवान् श्री रजनीश 

ध्यान केंद्र में गुरु शिष्य परंपरा का स्वरुप बाकि जगहों से बिलकुल अलग ,मस्ती भरा और दोस्ताना है .



ओशो शिष्यों के साथ नृत्य मुद्रा में 


हम ऐसे अहले -नज़र  को सबुते हक़  के लिये 
अगर रसूल न आते तो सुबह काफी थी 

स्वामी चिन्मय योगी जी के साथ डॉ सत्यजीत साहू 

23 मई 2011

मैत्रेय जी पूना आश्रम में मेरे सबसे बडे संरक्षक थे .

22 -5 -11  
गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी जी के साथ  स्वामी आनंद चैतन्य 
आज रविवार सत्संग का  दिन है .
मै सही समय पांच बजे शाम को ही चला गया .वहां जाकर कूलर में पानी भरा .गर्मियों के दिन में सत्संग हाल काफी गर्म हो जाता है .दो कूलर भी पूरे रूम को ठंडा नहीं कर पाते है.
सभी गुरुभाइयों को फ़ोन लगाया और आने को कहा .
गुरुदेव के घर में रिश्तेदार आये हुवे है .गुरुदेव उनसे  घर की बैठक में  बातें कर रहे है.
मुझे अपने घर से रात्रि के खाने की सब्जी लानी है इसलिये घर वापस गया .
पुनः ध्यान केंद्र में आकर देखा तो पिंकू ,सूरज ,हेमंत आ चुके है .


सूरज पिछले दो साल से लगातार आ रहा है .सूरज भिलाई यानि यहाँ से ४० किलोमीटर दूर से रविवार सत्संग के लिये आता है .इतनी दूर से लगातार सत्संग में आते रहना और यहाँ का काम भी करना यह सब देखकर सभी लोग सूरज से काफी प्रसन्न है .गुरुदेव भी उसकी इस सेवाभाव  की खूब तारीफ करते है .
गुरुदेव के मार्गदर्शन में खाना बनाते हुवे सूरज ,साथ में डॉ सत्यजीत  साहू 
एक प्रसंग में सूरज को यह लगा भी की अब सत्संग में लोग मेरी   बुराई  ही करेंगे पर गुरुदेव ने अपने प्रेम और आश्रीवाद से सूरज का मन बदल दिया .गुरुदेव के प्रति सूरज की आस्था और बढ gayi  .अब सूरज आश्रम में सर्वाधिक श्रम दान करता है .आज रविवार के भोजन बनाने का सारा भर सूरज ने अपने ऊपर लेकर भक्ति भाव और प्रेम से बनाकर सबको दीखाया  भी .
सूरज से गुरुदेव बातें कर रहें है .सूरज अपने घर की बातों को बता रहा है .गुरुदेव ने उसको बहुमूल्य मार्गदर्शन दे रहें है और घर के सदस्यों की मानसिकता बता रहें है .सूरज को अपने घरवालों को समझने में आसानी हो रही है


हेमंत के मित्र बाबा पात्रे अपने साथ एक और मित्र को लेकर आये अहि .गुरुदेव ने उनकी कुंडली देख कर जीवन में सुधार के लिये उपरत्न धारण करने की सलाह दी .

गुरुदेव के साथ हेमंत 
हेमंत कई प्रकार के प्रश्न गुरुदेव से पूछ रहे है जिसका समाधान गुरुदेव दे रहे है .
"गुरुदेव आपके पास जिसका भी काम बन जाता है वो फिर आना छोड़ देता है ?" हेमंत ने पूछा.
"देखो जब आप दवाई दुकान जाते हो तो जैसे ही आपको दवा मिल जाती है आप वहां खडे थोड़ी ने रहते हो .वैसे ही  यहाँ  आने वाले का जब काम बन जाता है वह चला जाता है .जैसे रितेश आया था की शादी नहीं हो रही है .पर अब जब शादी हो गयी तो नहीं आता है .अब उसको कोई दूसरी शादी तो नहीं करनी है .यह बहुत सरल है "  गुरुदेव ने कहा .

सत्संग में गुरुदेव बातें करते हुवे 
ग्रुरुदेव हेमंत को भगवान् श्री रजनीश जी की बातें बता रहे है .इसी बीच मै ध्यान केंद्र की संगृहीत चीजों की फाइल ले कर आया .गुरुदेव उस फाइल में दिखाकर ओशो और उनके व्यक्तित्व की कई बातें सब शिष्यों को बता रहे है .इसी बीच अनिल और अमित  भी आ  गये  .

 स्वामी आनंद मैत्रेय  जी दीक्षा देते हुवे 
स्वामी  आनंद मैत्रेय  जी दीक्षा देते हुवे 
गुरुदेव ने  स्वामी आनंद  मैत्रेय  जी के बारे में बताना शुरू किया " मैत्रेय  जी पूना आश्रम में  मेरे सबसे बडे संरक्षक थे .उन्होने आश्रम में मेरे लिये बहुत कुछ किया .ओशो ने मैत्रेय  जी के ऊपर मेरा दायित्व डाल दिया था .मैत्रेय  जी मुझको बहुत ही जादा प्रेम किया करते थे .उन्होने ही ओशो से मेरे संपर्क को आसान और प्रगाढ़ किया .मेरे सारे पत्रों को वो ही ओशो के पास जाकर दीखाते और मुझे उनके उत्तर दिलवाया करते थे ."
मैत्रेय  जी का अंतिम पत्र
मृत्यु के दिन दीक्षा देते हुवे    स्वामी आनंद मैत्रेय  जी 

"उन्होने अपनी व्यक्तिगत बात भी मुझे बताई थी  मैत्रेय  जी बहुत ही सहज और सरल थे .उनको मिलकर यह लगता ही नहीं था की वो राष्ट्रिय स्तर की राजनेता रह चुके थे .मैत्रेय  जी उपलब्ध व्यक्ति थे .उनके लिखे हुवे कई पात्र मेरे पास है .उन्होने अपनी मृत्यु के दिन की अंतिम फोटो और  पत्र मेरे लिए लिखा था जो बाद में ओशो ने मुझे दिया .यह पत्र उन्होने मृत्यु के दिन लिखा था .उनको मालूम था की उनकी मृत्यु होने वाली  है .उस दिन उन्होने अपना प्रेस का सारा काम किया .आश्रम में दीक्षा दी .उसी की फोटो यहाँ है .अपने रूम गये .काफी पी अंतिम प्रणाम लिखा कर मुझको पत्र लिखा फिर अपना देह त्याग दिया .बहुत महान थे  मैत्रेय जी .भगवान्  श्री रजनीश के आश्रम में  ओशो के रूम में किसी भी समय आने जाने की विशेष इजाजत थी उनको .एक मात्र व्यक्ति मैत्रेय  जी है जिनके शरीर को मृत्यु के बाद  ओशो ने अपने पोडियम पर रखकर अपने हाथों से फूल अर्पित किया था . पूना आश्रम में भी उनकी ओशो के बाद नम्बर दो की  ईज्जत  थी . आश्रम में उन्होने लोगों को बता रखा था की मै उनका भतीजा हूँ .इसी कारण से मुझे आश्रम में इतना मान मिलता था और मै आश्रम में रहने वालों के बीच लोकप्रिय हो पाया ."

फाइल  में बहुत सारे दस्तावेज थे जो भगवान् श्री के समय की घटना क्रम को बता रहे थे .गुरुदेव भगवान् श्री के समय की अपनी स्थिति और साधना के बारे में, दस्तावेज को दिखा कर बातें बता रहे थे .
भगवान श्री के रंग में रंगे स्वामी चिन्मय योगी ,माँ प्रेम अर्चना ,एवं पुत्र  अनुराग 
आगे गुरुदेव ने कहा " इस सबको देख कर ही पता लगता है की मैने भगवान् के प्रेम में डूब कर कितनी मेहनत की है और मेरा जीवन किस प्रकार उनके प्रेम में रंगा हुआ था ."

अनुराग भैया भी रविवार का भोजन ध्यान केंद्र में करे है .कई प्रकार की पारिवारिक बातों का जिक्र वो हमारे बीच कर रहे थे .गुरुदेव ने भी उनको बहुत अमूल्य मार्गदर्शन दिया .उनको भी आजकल सत्संग में आने में मजा आता है और उनकी हमारे बीच बैठने की   झिझक ख़त्म  हो गयी है .














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