30 अप्रैल 2011

कमल शर्मा के ये शब्द अनमोल है

गुरुदेव 
"आप जब छोटे थे तो क्या आप चिंता करते थे की आपका भोजन घर पर है की नहीं .आपको आपकी जरुरत की चीजे आपके  माता पिता पूरी करते है इसी प्रकार हम सब अपने गुरुदेव के बच्चे है इसलिये चिंता की क्या बात  है .बाप है हमारा वो देखेगा ." कमल शर्मा ने कहा .
कमल वस्तुतः गुरु के प्रेम सारे कल्याण हो जाने के बाबत एक गुरुभाई को आस्वस्त कर रहे थे .
"गुरु की धोती पकड़कर आप मांगों .वो आपका बाप है वो ही देगा .आप खुद करने की कोशिश मत करो .क्यों किसी क्रिया को करने की झोखिम लेते हो .मेरी तो सारी उपलब्धि गुरु की कृपा के कारण है.  "

कमल शर्मा के ये शब्द अनमोल  है 

29 अप्रैल 2011

अमित और राशी

गुरुदेव के परम और आशीष में डूबे अमित और राशी 
गुरुदेव के साथ उठते बैठते बहुत सारी बातें होती है .देश दुनिया , राजनीती  ,पाक विद्या ,क्रिकेट  इत्यादि सामायिक बातें होती है .कई बार तो कुछ विषयों पर जब मै कोई धारणा नहीं बना पाता हूँ  तो गुरुदेव के विचारों से खुद के विचार बन जाते है और सोच को नई दिशा मिल जाती है .

घर परिवार और कामकाज के बारे में गुरुदेव से बहुत बहुमूल्य दिशा निर्देश मिलता है. आज हम सभी गुरुभाइयों के जीवन में रूपांतरण आया है उसका मुख्य कारण घर परिवार और आजीविका के बाबत सही दिशा है .इसमें गुरुदेव के सत्संग और आशीष का बहुत ही बड़ी भूमिका है .

अमित शर्मा जी जो मेरे गुरुभाई है और पिछले पांच  साल  से गुरुदेव से दीक्षित  है.इनका  संन्यास नाम स्वामी आनंद शिवा है . पांच साल पहले जब ये पहली  बार गुरुदेव के पास आये थे तब इनकी समस्या थी की इनका विवाह नहीं हो पा रहा था . विवाह में इनकी पत्नी राशी के घर वाले राजी नहीं थे और अमित बहुत जादा  उत्सुक थे .दूसरी समस्या थी की राशी और उसके घर वालों को बहुत जबरदस्त   बाहरी बाधा थी .

गुरुदेव ने दोनों की पत्रिका को देख कर मुझसे कहा " ये अमित शादी के लिए मरने को उतारू है और पत्रिका में विवाह मिलान बहुत अच्छा नहीं दिख रहा है .तू बता इस शादी के लिए ज्योतिष की दृष्टी से किस प्रकार से अनुमति दी जाये ."
विवाह के बाबत ज्योतिष के अनुसार सारी बातें अमित अच्छे से  को बता दी गयी .  पर अमित के सर पर तो जैसे भुत सवार था की शादी ही करूंगा .वो इस कदर दीवानां था की ज्योतिष  की प्रतिकूल  बातों को सुनकर ज्योतिषियों के ऊपर भी नाराज हो जाता था .अंत में गुरुदेव ने कहा की अगर यही नियति है तो अपनी  जिम्मेवारी  पर तू शादी कर ले .बाकि जैसे ही राशी तुम्हारे घर की बहु बन जाएगी तो उसकी बाहरी बाधा को मै ठीक  कर दूंगा .अमित और राशी की शादी सकुशल हो  इसलिए विशेष पूजा भी गुरदेव ने की .उसी समय 2006 को  भैरव बाबा की पूजा गुरुदेव ने हमारे सभी गुरुभाई लोगों के हित में भी  की .अमित और राशी का विवाह आर्य समाज की रीति से संपन्न हुआ .बाद में राशी की बाहरी  बाधा  की समस्या भी गुरुदेव ने ठीक कर दी .

अब जब भी राशी अमित   की बात पति पत्नी विवाद के कारण गुरुदेव के पास  आती है तो गुरुदेव समझा देने के बाद प्रारब्ध की बात अवश्य दोनों को बोल  देते है और उनके अपने विवाह विषयक चुनाव की बात याद दिला देते है.


इसी सन्दर्भ में एक घटना याद आ गयी .एक दिन सत्संग में राशी और अमित आये हुवे थे .किसी बात को लेकर राशी अमित के ऊपर बहुत जादा नाराज हो गयी .और जब   राशी नाराज हो जाये तो भूकंप आ जाता है .
तभी गुरुदेव ने कहा की तुम सभी स्त्रियों के पतियों में बहुत सारी खासिअत  है और इनका सत्संग में आने के कारण बहुत सकारत्मक परिवर्तन हो रहा है .गस्से से भरी राशी  ने सबके सामने गुरुदेव को कहा "आपकी बात तो  ठीक  है स्वामी जी पर आप मेरे अमित की एक भी खासियत  बता दीजिये तो मै मान जाऊं ."( राशी चूँकि अमित की सारी बातें जानती है तो बडे शान से बोल दीं .)
गुरुदेव ने प्रेम भरी मुस्कराहट के साथ तुरंत कहा "एक तो मै अभी बता देता हूँ  सबसे पहली खासियत  तो अमित की  ये है की इसने तुमसे शादी की है "इतना सुनने के बाद तो राशी शरमा गयी  और बोली "हाँ स्वामीजी ये बात तो सोनू में है "(प्यार से राशी अमित को सोनू बोलती है )


एक दिन  सत्संग में हम   सभी गुरुभाइयों  की प्रगति पर बात चल रही थी . गुरुदेव सबकी अवस्था के बारे में बता रहे थे  तब मैने गुरुदेव से पूछा की मेरी अपनी अध्यात्मिक  प्रगति कैसी है .
 " तुम्हारा ठीक चल रहा है . किसी भी परिस्थिति में तुम मंत्र जाप ,साबर,सत्संग ,हवन,प्राणायाम ,आहार संयम  को मत छोड़ना. इसको जीवन भर करते रहना . ऐसी स्थति में मै मृत्युपरांत भी तुम्हारे हित में कार्य करते रहूंगा .और उस समय यह कार्य मेरे लिए इस वक्त के बनिस्बत जादा आसान रहेगा. गुरु और इस्ट की सदैव पूजा भक्ति करते रहना " गुरुदेव ने मुस्कुराते  हुवे कहा .


जय गुरु महाराज की जय






28 अप्रैल 2011

ghatarani trip ki photo

गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी 


घटा रानी की तस्वीर इस पोस्ट में है .यह यात्रा एक पिकनिक थी जो अगस्त २००९ में गुरुदेव के पावन सानीध्य  में हुई थी .

गुरुदेव 







गुरुदेव के साथ डॉ सत्यजीत साहू 

पिंकू ,गुरुदेव हेमंत सत्तू गप्पू 





अमित सत्तू गुरुदेव ,हेमंत, गप्पू, पिंकू 
गुरुभाई  गुरुदेव के आशीष में 








डॉ सत्यजित साहू और पंकज शर्मा 





26 अप्रैल 2011

तुम दो चीज मत करो .पहला बीसी और दूसरा शराब

गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी 
"सत्संग में मेरे दोस्त हबीब आये हुवे है 
हबीब सात आठ साल पहले भी ध्यान केंद्र आये हुवे है .गुरुदेव से उनका परिचय है .आठ साल पहले हबीब शहर के बड़े अंग्रजी के आध्यापक थे और उनकी कोचिंग बहुत जादा अच्छी चलती थी . पर बाद से  सालों में उनकी कुछ चारित्रिक कम जोरियों  के कारण उनका धन ,मान , पारिवारिक शुख नस्ट हूँ गया . अब गये एक साल से उन्होंने मदिरा से तिलांजलि लेकर अपनी अच्छी स्थिति पुनः प्राप्त करने के लिए प्रयास कर रहे है .
हबीब अपने दोस्त गिन्नी को लेकर ठीक साढे चार बजे ध्यान केंद्र आ गए .
उस समय मेरे गुरुभाई भी नहीं आये थे 
मैने उनका स्वागत किया और हम तीन आपस में चर्चा करने लगे .मैंने हबीब की पत्रिका देख कर उसको कुछ रत्नों और व्यावहारिक बातों को पालन करने के लिए सलाह दी और भविष्य के लिए आगाह किया की और आगे जीवन में किसी भी तरह का नुक्सान न हो इस प्रकार के आचरण की सलाह दी .
गुरुदेव कुछ समय के बाद ऊपर सत्संग हाल में आये .
बाकी सब लोग भी आगे .सत्संग हाल खूब भरा लगने लगा .
सब आपस में मस्ती भी कर रहे थे और आई पी एल का आनंद भी ले रहे थे .
बीच बीच में गुरुदेव भी आनंद दाई बातों के बीच अपनी कल्याण कारी सलाह भी दे रहे थे .

हबीब ने कहा " गुरुदेव आपका आशीर्वाद चाहिए . मुझको आब जीवन में आगे ही बढ़ाना है "

गुरुदेव ने प्रेम भरी मुस्कराहट से कहा " मेरा आशीष तो हमेशा ही है .मैंने तो तुमको आठ साल पहले इसी जगह कहा था की तुम दो  चीज  मत करो .पहला बीसी और दूसरा शराब . पर तुम माने नहीं .और देखो इसी दो कारणों से तुम्हारी सारी सफलता  हाथ से चली गयी . आब और भविष्य में इन्ही दो से बच कर चलोगे तो तुमको सफलता मिलेगी ."
"गुरुदेव मै कोशिश करूंगा  की आगे ऐसा मत हो ...और मुझे सफलता ही मिले ." हबीब ने कहा
गुरुदेव मेरी पत्नी मेरे साथ रहने आएगी की नहीं ?"   
देखो पत्नी और तुम्हारे घर वालों के साथ कलह का तुम्हारा योग है .इसलिये तुमको ही बैक गेयर लगा कर उसको मना कर  घर लाना चाहिये ." गुरुदेव ने कहा .
"जी गुरुदेव " हबीब  ने कहा .
फिर रात में गिन्नी और हबीब से मिलने प्रणय भी ध्यान केंद्र आया 
सभी आगतुक लोगों के लिए भोजन बन चूका था 
सबने प्रेम से भोजन का आनंद लिया .
गिन्नी और हबीब को खाना विशेष रूप से पसंद आया .गुरुदेव यह देखकर आनंदित हुये .
















23 अप्रैल 2011

शिव जी की चालीसा पर अटूट विश्वास


गरियाबंद का विशाल शिवलिंग

मेरे  एक परिचित है श्री एस के दीक्षित जी जो वर्मान में गोदावरी इस्पात के ड्राइंग विभाग के हेड है .दीक्षित जी बहुत अच्छे साधक है और देवी माँ के भक्त है .

उनसे बात चल रही थी की उन्होंने अपने जीवन की घटना सुनाई. जब वो अट्टारहउन्नीस साल के रहे होंगे तब  अपने गाँव चकर भाठा   में खूब बिंदास जीवन बिताया .चकर भाठा बिलासपुर के समीप ही एक गाँव है जहाँ सपेरों की बस्ती भी है . उन सपेरों से उन्होंने सांप पकड़ना सिखा लिया था .एक दो जहर वाले सांप को छोड़ कर वो बाकी सभी साँपों से खेल किया करते थे .कई बिना जहर के साँपों को तो वो बिल दे निकल कर खेला करते थे . इस बहादुरी में उनको खूब मज़ा  आता था .

एक दिन जब महाशिवरात्रि थी तब उन्होंने एक सांप को बिल से निकाल लिया और लोगों को खेल दिखाने के बाद उसे छोड़ दिया .आगे वो जब जा रहे थे तो एक घर में सांप निकला जिससे घर वाले शोरगुल मचाने लग गए . ये सब सुनकर दीक्षित जी ने जाकर उसको पकड़ कर जान से मार दिया .कई बार घरों में ऐसा होने पर सांप को मार दिया जाता है .


घर आकर दीक्षित जी को अपने मन में बहुत संताप हुआ .कई बुजुर्गों  भी उनको  इस काम के लिए
भूरा भला कहा था .

कुछ पूजा पाठ करने की ललक उनमे थी ही और वो बचपन में ही गाँव के  बैगा के पास कुछ तंत्र मंत्र सिख लिए थे साथ ही साथ छोटा मोटा भुत प्रेत भी भगाना सिखने की कोशिश कर रहे थे .
इसी सिलसिले में उनके हाथ एक किताब लगी .वो छोटी सी पुस्तिका थी जिसका शीर्षक था "तांत्रिक शिव चालीसा " उन्होंने उसको रट डाला था .


उस दिन उनको ख्याल आया की आज शिव रात्रि है और इस पाप के लिए उन्हे शिव जी के पास जाना ही है तो अब  जाकर शिव जी के पास इस चालीसा की सिद्धि भी कर लूंगा .
भरे मन से वो निकले तो अपने गाँव  के पास ही पीपल पेड़ के नजदीक एक शिव लिंग के पास रुक  गए . उस शिव लिंग की उस दिन पूजा भी हुई थी और उसकी मान्यता भी थी . उसी दिन उन्होंने वहां अपने कृत्य के लिए  पश्चाताप किया और शिव चालीसा को सिध्ह करने की प्रक्रिया भी की . उस किताब में लिखा था की जो भी कार्य इस चालीसा को पढ़ कर किया जायेगा वो पूरा होगा .
उन्होंने अगले दिन से लोक कल्याण  के लिए इस प्रयोग करने का  मन बनाया .और उसके बाद एक दो प्रयोग उत्सुकता में किये .उनको सारे कार्यों में सफलता मिली .इससे उनका विश्वास इस तांत्रिक शिव चालीसा में जम  गया .
दीक्षित जी कहते है " जिस शिव चालीसा को तांत्रिक लिखकर विशेष बताया गया था पुस्तक में वो सामान्य शिव चालीसा ही थी और वो सर्वत्र मिलती है पर शिव जी के नाम का प्रताप ही है जो उस चालीसा से लोगों के काम बनते है और आज तक मेरा शिव जी की चालीसा पर अटूट विश्वास कायम है "
जय गुरु महाराज की जय

22 अप्रैल 2011

अपनी माँ को घर से बाहर निकालने पर तुले है

गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी
रिखू  और उसकी पत्नी रमा ने अपने पिता की मृत्यु  के बाद अपनी माँ को बोझ समझ कर पालने लगे . रिखू की पत्नी रमा ने उसके मन में अपनी माता के लिए सारे अच्छे भाव मिटा दिए. 
रमा के बच्चे अब कॉलेज में पढने लगे है. खर्चा उनका मज़े से चल जाता है रिखू की कमाई अच्छी है  .

 रिखू की बहन  हमारे मुह्हले में रहती है .वो अपनी माँ को लेकर  बहुत परेशान है. उसकी माँ चूँकि अनपढ़ है  इसलिए उसके भाई और भाभी ने मिलकर उसकी सारी संपत्ति अपने नाम कर ली है .
अब वो लोग अपनी माँ को घर से बाहर निकालने पर तुले  है. माँ को रिखू की बहन के पति ने बोल दिया है की अगर इतनी परेशानी है तो बोरिया बिस्तर बांध कर मेरे घर आ जावो . माँ  भी जिद  पर है की अपने घर पर ही मरूंगी पर  दुसरे घर नहीं जाउंगी .

लोगों ने रिखू की पत्नी रमा को समझाया की आप अपनी सास के साथ ऐसा मत करो .जो जैसा बोता है वैसा ही काटता है .माँ को परेशान करने से आपके बच्चे भी आपको बाद में वैसा कर सकते है .इतना सुनाने पर रमा बोली " मै क्या अनपढ़  हूँ जो बिना जाने अपने बच्चों के हाथ में सारी संपत्ति लिख दूँगी ."

अहंकार और विभ्रम ने उसके संस्कार नष्ठ  कर दिए है.

( गुरुदेव ने मुझे एक ऐसा परिवार दिखाया  है जिसमे  जिस बहु ने अपने सास ससुर को मारा पीटा और भूखा रख कर मार दिया उसकी बहु  ने भी  ठीक वैसा ही उसके साथ किया )

21 अप्रैल 2011

अभ्यास करने से उत्तम गुण आ जाते है

समर्थ रामदास 
एक दिन समर्थ रामदास जी एक गाँव से गुजर रहे थे .वहां के लोगों ने उन्हें एक ठग समझ कर उनका अनादर किया .रामदास जी ने शिष्यों को कहा की आप इनका प्रतिवाद मत करो .आगे जाने पर एक नए गाँव में बहुत आदर सत्कार मिला तब भी गुरुदेव चुप रहे .कुछ अच्छे कीर्तन गा कर आगे चल दिए .
रामकुमार नामक शिष्य ने पूछा तो रामदास जी ने उत्तर दिया "रूप और लावण्य का अभ्यास नहीं किया जा सकता, स्वाभाविक गुणों के लिए कोई उपाय नहीं चलता परन्तु अवगुण छोड़ देने से चले जाते है ,अभ्यास करने से उत्तम गुण आ जाते है .जो समझ बुझ कर बर्ताव करते है वही भाग्यवान कहलाते है ,उन्हे छोड़ कर बाकी सब अभागे है "
(बोध कथा )

18 अप्रैल 2011

"प्यार है उनके लिए और हमसे फकत बातें है "


गुरुदेव के साथ सूरज ,पाक विद्या सत्संग

सत्संग हाल में बैठकर सब ipl  का मैच देख रहे है .सभी लोग आ गए है .क्रिकेट का मज़ा शुरू हूँ गया है सब अपनी अपनी टीम को सपोर्ट कर रहे है. उत्थपा  और युवराज के फैन पुणे को सपोर्ट  कर  रहे है . पिंकू पुणे को जितना चाह रहा है .खेल शुरू हो गया है .कमल शर्मा जी पहले आ गए है . उनसे प्रश्न पूछने और वार्तालाप के लिए सूरज को बोला पर मैच के रोमांच में कुछ भी बात नहीं हो पाई .गुरुदेव के आने पर मजाक मस्ती और बढ़ गयी .
"तुम लोग क्या चर्चा का कार्यक्रम रखे हो उसको शुरू करो " गुरुदेव ने कहा .
"गुरुदेव आप स्वयं है यहाँ और क्या चाहिए .आपके सत्संग का लाभ ही सर्वोत्तम चर्चा है " कमल ने कहा .मुझको कमल ने कहा की IPL  का मज़ा चल रहा है इस माहौल को चलने दीजीय. बाकि बातें तो होती रहेंगी और कभी बैठ जायेंगे .
सबका ध्यान क्रिकेट और चाय और मजाक में लगा हुआ है .
सूरज चाय बनाकर फारिग हुआ तो गुरुदेव ने उससे कहा " हाँ सूरज कई प्रश्न है तो पूछ ले .
"गुरुदेव सब लोग मुझको नाकारा और निकम्मा ही कहते है इसका मुझको बहुत दुख होता है .घर वाले  और बाहर में भी सब मुझको यही कहते है " यह कहकर सूरज के आँखों में आंसू आ गए .
गुरुदेव ने प्रेम पूर्वक  कहा " लोग  मुझको  भी बोलते है .पर यह बोलना उनकी समस्या है मेरी नहीं . मै  अपने विवेक से सोचता हूँ चिंतन करता हूँ लोगों के बोलने ,नहीं बोलने ,प्रशंसा करने निंदा करने से आब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता .मै जनता हूँ की यह उनकी समस्या है मेरी नहीं . मुझको मेरे गुरुदेव ने भी यही कहा की तुम अपनी जागरूकता से जीना कौन क्या कहता है क्या नहीं कहता है इसकी जरा भी फ़िक्र  नहीं करना ."
बहुत प्रकार की बात करने के बाद सूरज को अच्छा लगा
गुरुदेव ने सबको प्रसाद दिया .एक बार सबको देने के बाद सूरज को और अलग से प्रसाद दिया .सूरज के मन में और प्रसाद लेने की बात थी ,दुबारा मिलने से उसका मन प्रसन्ना हो गया .
तभी गुरुदेव ने कहा "मुझको एक गाने की लाइन याद आ गयी "प्यार है उनके लिए और हमसे फकत  बातें है " सूरज इस ध्यान केंद्र की जान है अगर ये नहीं आये तो मज़ा ही नहीं आता ."

सभी लोग हँसे पड़े .
सूरज के दिल में सुकून आया .

सदगुरू दावं बीछाइया
खेले दास कबीर

16 अप्रैल 2011

the great idea of kamal sharma

कमल शर्मा 
 April 2011


Just another day I went to meet new friend of mine, mr  kamal sharma ji . He is general secretary of samverti devsthanam spiritual trust .  He  is just 35  young ,widely experience fellow, disciple of baba avadhut samuhratna ji of kunkuri . He is very attractive in looks as wall as in his talks. He has wide perspective as he read and practice various spiritual lineage including the one in which he is right now the great aghori parampara of bhagwan ram of benaras.

I consider him the most spiritual young person ( ofcourse after me ) .

He said that people asked him how he does all that material job which  are considered miracle by people .

”are yaar aap sadguru ke charnon par ho ,uski dhoti pakadkar maang lo sab ho jayega, ye hi raaj hai “ he said.

Oh…….. such a simple method. Loving and prayerful attitude has made his job done. Miracle has happened with him. I got the idea sir ji .

So the great idea of our beloved kamal sharma ji worked for him.

There at his place I met mr nagendra dubey  ji of topper’ educational society.

Nagendrs dubey  is again revolutionary and did a lot of new things for raipur in terms of social change.

On the way of talking he praise his wife and he come to inform me that his wife has made textbook for his primary school herself.

Got the idea sir ji

I thought to derive textbook of life for next generation to understand spirituality if they belongs to my taste.



Some of the books are following:-

Krishna smiriti, Bihani mandir diyana bar, jagat tariya bhor ki and shaj ashiki nahi by my beloved, beloved great dada guru bhagwan shree Rajneesh the osho

Autobiography of yogi by paramhansa yoganand

Living with Himalayan masters by swami rama

Aghora by Robert svovada

My diamond days with osho by pram shunyo

Yog nidra by paramhansa satyanand

Pranayam rahasya by swami ramdev



Just ten book for the beginning and it surely last upto the end.

But I did not came to end so it is one of the endless end .









mantra is to be done by grihastha .





गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी जी के साथ श्रीमती प्रीती साहू 
What is happening at osho nirav dhayan Kendra




Yes there has always been the flow at the dhyan Kendra.

Recently the chaitra navratra has observed for the year 2011. on this festive I asked gurudev that which sadhana we do at this time .He tell us to do the mantra of devi has to be recited and yagya of that mantra is to be done by grihastha .

Additionally he said that why only in navratra I do recite devi manta daily .



“Gurudev please tell me the mantra which you are doing daily”. I asked

Write down the mantra to be recited daily for grihasta

“Gurupujan mantra

Ganesh mantra 11 times

Benefic ghraha 1st 5th 9th lord tantrik beej manta

Rahu mantra ketu mantra

Vasudev,sai,lakxmi,narayan mantra with tulsi mala

Chamunda ma, durga ma, kuber ,narmada baba ,laghu mritunjay,hanuman,shiv, kaal bhairav and batuk bhairav mantra

All the above deity mantra to be recited daily for the overall well being of grihasta. Additionally mantra can be recited on the basis of adverse ghraha yog or the timeneeded purpose. Most of the time above 18 mantra are sufficient to give proctation and blessing to the grihastha bhakta. At the end of mantra jap personal prayer to be done to the deities to forgive all the sins of your family and you now and forever . Also do the prayer for the blessing and well being of yourself and each of your family and your dear ones.”



Well is it really works ?

I personally found that it works.

So it is up to you to try it. But whenever you try try it for minimum six month.You will get the answer.

11 अप्रैल 2011

Shakta Sadhana- (The Ordinary Ritual) -3by Sir John Woodroffe

Shakta Sadhana- (The Ordinary Ritual) -3by Sir John Woodroffe






All orthodox Hindus of all divisions of worshippers submit themselves to the direction of a Guru. The latter initiates. The Vaidik initiation into the twice-born classes is by the Upanayana. This is for the first three castes only, viz., Brahmana (priesthood and teaching), Kshattriya (warrior) Vaishya (merchant). All are (it is said) by birth Shudra (Janmana jayate Shudrah) and by sacrament (that is, the Upanayana ceremony) twice-born. By study of the Vedas one is a Vipra. And he who has knowledge of the Brahman is a Brahmana (Brahma jñanati brahmanah). From this well-known verse it will be seen how few there really are, who are entitled to the noble name of Brahmana. The Tantrik Mantra-initiation is a different ceremony and is for all castes. Initiation (Diksha) is the giving of Mantra by the Guru. The latter should first establish the life of the Guru in his own body; that is the vital power (Pranashakti) of the Supreme Guru in the thousand-petalled lotus (Sahasrara). He then transmits it to the disciple. As an image is the instrument (Yantra) in which Divinity (Devatva) inheres, so also is the body of the Guru. The candidate is prepared for initiation, fasts and lives chastely. Initiation (which follows) gives spiritual knowledge and destroys sin. As one lamp is lit at the flame of another, so the divine Shakti consisting of Mantra is communicated from the Guru's body to that of the Shishya. I need not be always repeating that this is the theory and ideal, which to-day is generally remote from the fact. The Supreme Guru speaks with the voice of the earthly Guru at the time of giving Mantra. As the Yogini Tantra (Ch. I) says:



Mantra-pradana-kale hi manushe Naganandini



Adhishthanam bhavet tatra Mahakalasya Shamkari



Ato na guruta devi manushe natra samshayah.





(At the time the Mantra is communicated, there is in man (i.e., Guru) the Presence of Mahakala. There is no doubt that man is not the Guru.) Guru is the root (Mula) of initiation (Diksha). Diksha is the root of Mantra. Mantra is the root of Devata, and Devata is the root of Siddhi. The Mundamala Tantra says that Mantra is born of Guru, and Devata of Mantra, so that the Guru is in the position of Father's Father to the Ishtadevata. Without initiation, Japa (recitation) of the Mantra, Puja, and other ritual acts are useless. The Mantra chosen for the candidate must be suitable (Anukula). Whether a Mantra is Svakula or Akula to the person about to be initiated is ascertained by the Kulakulacakra, the zodiacal circle called Rashicakra and other Cakras which may be found in the Tantrasara. Initiation by a woman is efficacious; that by the mother is eightfold so (ib.). For, according to the Tantra Shastra, a woman with the necessary qualifications, may be a Guru and give initiation. The Kulagurus are four in number, each of them being the Guru of the preceding ones. There are also three lines of Gurus

8 अप्रैल 2011

Shakta Sadhana- (The Ordinary Ritual) -2by Sir John Woodroffe


vanditagriyugey devi

Shakta Sadhana- (The Ordinary Ritual) -2by Sir John Woodroffe




Until a Sadhaka is Siddha, all Sadhana is or should be undertaken with the authority and under the direction of a Guru or Spiritual Teacher and Director. There is in reality but one Guru and that is the Lord (Ishvara) Himself. He is the Supreme Guru as also is Devi His Power one with Himself. But He acts through man and human means. The ordinary human Guru is but the manifestation on earth of the Adi-natha Mahakala and Mahakali, the Supreme Guru abiding in Kailasa. As the Yogini Tantra (Ch. 1) says Guroh sthanam hi kailasam. He it is who is in, and speaks with the voice of, the Earthly Guru. So, to turn to an analogy in the West, it is Christ who speaks in the voice of the Pontifex Maximus when declaring faith and morals, and in the voice of the priest who confers upon the penitent absolution for his sins. It is not the man who speaks in either case but God through him. It is the Guru who initiates and helps, and the relationship between him and the disciple (Shishya) continues until the attainment of spiritual Siddhi. It is only from him that Sadhana and Yoga are learnt and not (as it is commonly said) from a thousand Shastras. As the Shatkarmadipika says, mere book-knowledge is useless.



Pustake likhitavidya yena sundari jap yate



Siddhir na jayate tasya kalpakoti-shatairapi.



(O Beauteous one! he who does Japa of a Vidya (= Mantra) learnt from a book can never attain Siddhi even if he persists for countless millions of years.)



Manu therefore says, "of him who gives natural birth, and of him who gives knowledge of the Veda, the giver of sacred knowledge is the more venerable father." The Tantra Shastras also are full of the greatness of the Guru. He is not to be thought of as a mere man. There is no difference between Guru, Mantra and Deva. Guru is father, mother and Brahman. Guru, it is said. can save from the wrath of Shiva, but in no way, can one be saved from the wrath of the Guru. Attached to this greatness there is, however, responsibility; for the sins of the disciple may recoil upon him. The Tantra Shastras deal with the high qualities which are demanded of a Guru and the good qualities which are to be looked for in an intending disciple (see for instance Tantrasara, Ch. I). Before initiation, the Guru examines and tests the intending disciple for a specified period. The latter's moral qualifications are purity of soul (Shuddhatma), control of the senses (Jitendriya), the following of the Purushartha or aims of all sentient being (Purusharthaparayana). Amongst others, those who are lewd (Kamuka), adulterous (Para-daratura), addicted to sin, ignorant, slothful and devoid of religion should be rejected (see Matsyasukta Tantra, XIII; Pranatoshini 108; Maharudrayamala, I. XV, II. ii; Kularnava Tantra, Ch. XIII). The good Sadhaka who is entitled to the knowledge of all Shastra is he who is pure-minded, self-controlled, ever engaged in doing good to all beings, free from false notions of dualism, attached to the speaking of, taking shelter with and ever living in the consciousness of, the Supreme Brahman (Gandharva Tantra, Ch. ii).

7 अप्रैल 2011

Shakta Sadhana- (The Ordinary Ritual) -1by Sir John Woodroffe

Shakta Sadhana- (The Ordinary Ritual) -1by Sir John Woodroffe




Sadhana is that, which produces Siddhi or the result sought, be it material or spiritual advancement. It is the means or practice by which the desired end may be attained and consists in the training and exercise of the body and psychic faculties, upon the gradual perfection of which Siddhi follows. The nature or degree of spiritual Siddhi depends upon the progress made towards the realization of the Atma whose veiling vesture the body is. The means employed are numerous and elaborate, such as worship (Puja) exterior or mental, Shastric learning, austerities (Tapas), Japa or recitation of Mantra, Hymns, meditation, and so forth. The Sadhana is necessarily of a nature and character appropriate to the end sought. Thus Sadhana for spiritual knowledge (Brahmajñana) which consists of external control (Dama) over the ten senses (Indriya), internal control (Sama) over the mind (Buddhi, Ahamkara, Manas), discrimination between the transitory and eternal, renunciation of both the world and heaven (Svarga), differs from the lower Sadhana of the ordinary householder, and both are obviously of a kind different from that prescribed and followed by the practitioners of malevolent magic (Abhicara). Sadhakas again vary in their physical, mental and moral qualities and are thus divided into four classes, Mridu, Madhya, Adhimatraka, and the highest Adhimatrama who is qualified (Adhikari) for all forms of Yoga. In a similar way, the Shakta Kaulas are divided into the Prakrita or common Kaula following Viracara with the Pancatattvas described in the following Chapter; the middling (Madhyama) Kaula who (may be) follows the same or other Sadhana but who is of a higher type, and the highest Kaula (Kaulikottama) who, having surpassed all ritualism, meditates upon the Universal Self.