31 मार्च 2010

सहज भक्ति का निश्चल आनंद

परमात्मा, ईश्वर,देवी देवता ,गुरु के सामने व्यक्ति की कोई बखत नहीं है .

ये एक ऐसी प्रतीति है जो महसूस करने वाले को सामान्य जीवन और तमाम प्रगतिशीलता के आयाम से आध्यत्मिक आयाम की ओर ले जाती है

.क्या खास है इस प्रतीति में ?


जब व्यक्ति के सारे प्रयास असफल हो जाते है और उसे निराशा घेर लेती है तब उसको इस परिस्थिति इस उबरने वाले के सामने नतमस्तक हो जाने के अलावा और कोई उपाय नहीं रहता .

इसी को दैवीय शक्तियों का प्रभाव बोलते है .

इस असर का आनंद भक्ति से भरकर ही लिया जा सकता है .

अहंकार की भक्तिभाव में कोई जगह नहीं है और कृतघ्न भी भक्त नहीं है