7 जून 2010

सरकती जाये है रुख से नकाब आहिस्ता आहिस्ता

आज रविवार का दिन है. आज "सन डे सत्संग" का दिन है .  आज ध्यान केंद्र में भोजन में खिचड़ी और आमलेट बनाना तय हुआ है .मै आवश्यक सामग्री लेकर ध्यान केंद्र पहुँच गया हूँ .मेरे बाद डाक्टर अनिल वास्ती आये . मैने      कूलर और घडे में पानी भरा     पिंकू भी चाय के लिए दुध और  साथ में ब्रेड  लेकर पंहुचा .


"तू ब्रेड ले कर  क्यों आया है ?"  मैंने पुछा .
"खिचड़ी मुझे उतनी पसंद नहीं है .अगर मज़ा नहीं आया तो मै ब्रेड आमलेट खाऊंगा ."
"तू पागल हो गया है क्या .खिचड़ी जो स्वामीजी के निर्देशन में बनता है वो फाइव स्टार से भी  मजेदार और रिच  रहता है ."
"ठीक  है ना ,बचेगा तो वापस ले जायेंगे ."
खाने के प्रति पिंकू का रुझान अलग ही है .


मैंने अपनी साबर पूजा की और अनिल को " झाडा " किया .अनिल की बीमारी को देखते हुए वो स्वयं हर हफ्ते यहाँ शाबर तंत्र विधि से झड्वाता है .उसको दवा के अतिरिक्त इस इलाज से भी अभूतपूर्व लाभ हुआ है .
गुरुदेव आये .हम सबने प्रणाम किया .आज कमलेश आया है .वो स्वामीजी से सात साल पहले भी मिल चुका है .उसकी सत्संग ,साधना , गुरु में श्रद्धा है और ज्योतिष में भी वह आस्था रखता है .


खाना बनाने के लिए गुरुदेव ने मुझे तैयारी करने को कहा .   मैंने स्वामी जी के पास  मुंग दाल और चावल ला कर दिया .उन्होंने मुंग दाल और चावल को चार अनुपात  तीन  में निकाल कर अलग अलग रखने को कहा  .चावल को भीगा कर रखा गया .
"यह अनुपात ही सबसे महत्व का है .इसी कारण तो तुम्हारी खिचड़ी बिगडती है . अब मै जो पहले तुम्हारी रेसिपी की कापी में जो मसाला लिखवाया हूँ उसको निकालो ".

मैंने ८ लौंग और दाल चीनी, 4खड़ी मिर्च   हल्दी लालमिर्च निकला .मैंने लाकर दिखाया तो स्वामीजी ने उसके अनुपात को सही किया .

"स्वामीजी छोटी इलायची नहीं है "
"ठीक  है . मै अपने  इलायची के डब्बे से देता हूँ ."
"स्वामीजी यहाँ का बनाया हुआ गरम मसाला ख़त्म हो गया है .बाजार वाला है ."
"ला कर दिखावो "
"ये   लीजिये स्वामीजी "
"यह तो बिलकुल भी अच्छा नहीं है . मै लौंग इलायची दालचीनी अनुपात में देता हूँ .तुम ही यहाँ बना लो "

स्वामीजी  के दिए मसाले  को मैंने मिक्सी में डाला .पर मिक्सी के जर में थोडा झाँकने लगा तो उसके अंदर की चकरी निकल गयी .
"क्या हो गया ?"
"स्वामीजी मिक्सी के जार की चकरी टूट गयी "
"तुम पहली बार बना रहे हो. मत डरो.मेरे पास लाकर दिखावो ." मैंने ले जा कर दिखाया .
"ये  टुटा नहीं है निकाल गया है .देखो इसे ऐसे लगाते है ."
स्वामीजी ने ठीक कर के दिया तब मैंने मिक्सी में सामग्री रखी.
"देखो मिक्सी को ५ सेकेण्ड के लिए चलाना फिर बंद कर देना .ऐसा कई बार करने से तुम्हारा सारा मसाला पिसा जायेगा .अगर तुम लगातार मिक्सी को चला दोगे तो इसका मोटर जल जायेगा ."
"स्वामीजी मिक्सी को इस प्रकार लम्बा क्यों नहीं चला सकते ? " अनिल ने पुछा .
"अलग अलग मोटर की कपेसिटी अलग अलग होती है ."
मसाला पिसा गया तो उसकी खुशबू बहुत अलग ही थी




अनिल आज बहुत सारी तैयारी करके आया है की जोरदार मिल्क शेक बनाना है .उसने पिंकू की सहायता से मिल्क शेक बनाकर उसके ऊपर आइस क्रीम दाल कर सर्व किया .सबने शेक का आनंद लिया .

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मैंने स्वामीजी के बताये अनुसार मुंग दाल को तवे में सुखा भूंजा .फिर जब वो थोडा गुलाबी हुआ तो उसमे घी दाल कर फ्राई  किया .फिर दाल को कुकर में  चार अंगुल पानी ने डाल कर तीन सिटी में पकाया .
स्वामीजी ने दुसरे  चूल्हे में मसाला तड़का तैयार  करने को कहा .पहले कटे  प्याज को घी में फ्राई किया फिर उसमे लौंग ,इलायची ,दालचीनी, हल्दी ,लाल पीसी  मिर्च, खड़ी मिर्च , किसा अदरक, डाल कर अच्छी तरह भूंजा .

इसी बीच आमलेट के लिए सामग्री पिंकू ने स्वामीजी के बोलने के अनुसार तैयार किया .अंडा फोड़कर डाला ,उसमे बारीक़ कटा प्याज ,कटी हुई हरी मिर्च .नमक .थोढ़ा शक्कर .मिलकर फेटनी से खूब फेटा गया .

अब पकाने के गंज में चावल का पानी निकाल कर डाला गया. उसमे दाल  को कुकर से निकाल कर डाला .उसमे मसाला और थोडा घी डाल कर अच्छी तरह से मिक्स किया .स्वामीजी बता रहे है की अब चावल फ्राई हो  रहा है और तड़का मसाला पूरी तरह से  सारी सामग्री में मिल रहा है .
जब थोड़ी खुशबू आ गई और सारी सामग्री मिक्स हो गई तब फिर थोडा थोडा पानी डाल कर उसको बार बार घुमा कर पकाते गए .इस बीच स्वामीजी ने स्वाद अनुसार नमक और शक्कर डाला .गंज को ढक कर पकाने से भाप में जल्दी पकता है इअलिये उसको ढक दिया गया .गुरुदेव ने चेताया की तुम्हारा ध्यान  थोडा भी इधर उधर होने से जल जायेगा .मैंने बिलकुल  ध्यान से बीच बीच में निकाल कर सामग्री को चलाना जरी रखा तब जाकर अंत में खिचड़ी  पक गयी .ऊपर से धनिया पत्ती और थोडा घी दल कर ढक दिया .

स्वामीजी ने स्वयं आमलेट बनाकर दिखाया तब मैंने और बनाया .

खिचड़ी और आमलेट को प्याज और हरी  मिर्च नमक  के साथ गुरुदेव को सर्व किया .मैंने पिंकू और कमलेश ने भी भोजन  प्रसाद का आनंद लिया .
"स्वामीजी आज की खिचड़ी तो सबसे बेहतरीन  बनी है .इसने तो चिकन .मटन , कढी  सबको फेल कर दिया ."  पिंकू बोला .
"वाह क्या जोरदार शाही अंदाज़ की खिचड़ी बनी है स्वामीजी .इतना सुंदर स्वाद तो मैंने कभी नहीं खाया है ."मैंने कहा .
कमलेश बोला "ये तो इतना अच्छा है की थोडा और होता तो वो भी खिला जाता ."

स्वामीजी ने नीचे  अपने रूम से  हलवा और मीठी चकोली ला कर दिया .
"स्वामीजी इस मीठे ने तो स्वाद का नशा ला दिया है ."
"मुझे तो खाने के बाद मीठा खाना हमेशा ही अच्छा लगता है . "स्वामीजी ने कहा .
"मुझको  तो लग रहा है की भैरवी माँ ने यह प्रसाद भेजा है .क्या अद्भुत रस और आनंद इस भोजन का  आ रहा है."मैंने कहा .

पिंकू ने सारे बर्तन मांज दिए .कमलेश ने स्थान को पानी और झाड़ू से साफ किया .
खाने के बाद और बात चीत हो रही है .

मैंने पुछा "गुरुदेव मैंने अपने नए मित्रों के साथ जो उम्र ने मुझसे  तीन चार साल छोटे है बैठने  में  बहुत तकलीफ होती है .मेरे अंदर का इक चेतना का स्तर है. उससे  नीचे  आ कर उनके साथ उतरकर उनसे मित्रता बनाने में बड़ी कठिनाई आ रही है .आप तो इतने जयादा ऊँचे स्तर में रहते है आप कैसे निचे हमारे स्तर तक आ कर दोस्ती के अंदाज़ में रह लेते है ."
सद गुरु  अपने उच्च चेतना के स्तर पर जीता है पर शिष्य तो निचे के तल पर है .सदगुरु को निचे आना पड़ता है .मित्रता बनानी होती है .शिष्य को उसकी पूरी स्वतंत्रता देनी होती है .उसके साथ होना पड़ता है .फिर बीच बीच में मित्रों के अंदाज़  में सही बातें उनके कानो में डाल डाल कर दिमाग में सही बात बैठना पड़ता है. अगर निचे उतरकर शिष्यों को नहीं प्रेम कर पाया तो वो सदगुरु नहीं है ."
"मै  जानता हूँ की ये बहुत कठिन है. पर गुरु को शिष्य के लिए ,अपने गुरु के अभियान को आगे ले जाने के लिए इस कठिन कार्य को करना ही  होता है .ये ही तो सदगुरु का कार्य है पर यह होता है बहुत धीरे धीरे .अगर तुम अपना लो तो तुनको ही यहाँ ग्यारह साल लग गए ." गुरुदेव बोल रहे है "ये होता है आहिस्ता आहिस्ता "
"मुझको उस गजल की सुंदर बोल याद आ गए " मैंने कहा
"हाँ वाकई में बहुत खुबसूरत गजल है ." स्वामीजी ने मुस्कुरा कर कहा .

सरकती जाये है रुख से नकाब, आहिस्ता आहिस्ता

निकलता आ रहा है आफताब, आहिस्ता आहिस्ता

जवां    होने    लगे       तो   कर        लिया        पर्दा

हया इक लख्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता



(उसकी महफ़िल में बैठ कर देखो ,जिंदगी कितनी  खूब सूरत है ) 



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6 टिप्‍पणियां:

  1. सरकती जाये है रुख से नकाब, आहिस्ता आहिस्ता

    निकलता आ रहा है आफताब, आहिस्ता आहिस्ता
    .....vaah, aapke post me tantra vidya, poem or khaana banaane ka tarikaa bhi hota hai...adbhut...sundar.

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  2. रोचक संस्मरण लिख रहे हो,

    मजा आ रहा है।

    बहुत ही अच्छा संवाद लेख है

    धन्यवाद

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  3. अच्छा सन्स्मरण्। मानो हम उस घटना को प्रत्यक्ष देख रहे हों। और "आहिस्ता आहिस्ता" ही काम सरकता है और बेशक अच्छे परिणाम के साथ्। इही ला छत्तीसगढी मा कथे "धीर मा खीर, जल्दी मा लद्दी।

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