2 जून 2010

इसी को एक शब्द में प्रारब्ध कहते है

"मै इन लोगों की तुलना में कई गुना जायदा मन्त्र जाप कर चूका हूँ " हम लोगों की तरफ इशारा करके हेमंत ने कहा "मुझको तो कोई लाभ आज तक नजर नहीं आया .मेरा तो किसी भी मन्त्र ,पूजा पर से विश्वास ही उठ गया है .और तो और मेरा किसी भी गुरु पर भी ,साईं बाबा पर भी कोई विश्वास नहीं है .मुझको सारे गुरुवों पर शक ही होता है "
"शक करके गुरु के पास आना आधा आना होता है .शक्की मन से आप क्या लाभ ले पावोगे .शक आपकी कृपा और प्रसाद ग्रहण करने की सारी पात्रता ख़त्म कर देता है .अगर आप सही विधि ,सही दीक्षा से मन्त्र नहीं करोगे तो आप लाख क्या करोड़ मन्त्र जाप भी कर लो कुछ प्राप्ति नहीं होगी " गुरुदेव हेमंत को बोल रहे थे.
 "तुम्हारा प्रारब्ध ही अभि तक ख़राब है .तुम टीक से पढ़े  भी नहीं. तुम्हारे पास ,विद्या बल ,एप्रोच बल ,धन बल किसी में कमी रही होगी इसीलिए तुम  जज नहीं बन पाए .यानि प्रारब्ध ख़राब के कारण ही नहीं बन पाए . अभी शिक्षा कर्मी बनाना तुम्हारे भाग्य में था  इसलिए वही बन गए .शादी का अभी इस समय तक प्रारब्ध में नहीं था तो इतना खोजने के बाद भी शादी नहीं हुई .सिद्दी के लिए कु गुरु के चक्कर में पड़े तो गुरु  ने ही तुमको सही मार्ग नहीं बताया .ये ही तो प्रारब्ध है .अभी प्रारब्ध में तुमको शक करना है तो तुम वैसे हो यहाँ तुम आये और सिद्दी के लिए इतना बोले तो मै तुहारे कारण ही साबर तंत्र की दीक्षा देकर विधि बताया . पर तुम ही मात्र नहीं कर रहे हो बाकि सत्तू गप्पू कर रहे है सिद्ध हो गए है उनको प्रमाण लगातार मिल रहे है .तुम्हारा प्रारब्ध अभी ऐसा है तो दिख ही रहा है .और इन्ही सब के कारण तुम्हारा मन निराशा में है ."गुरुदेव ने कहा .
"गुरुदेव मै अभी आधे मन से ही यहाँ ध्यान केंद्र आ पता हूँ पर आपसे मिलना मुझको अच्छा लगता है ."हेमंत
गुरुदेव "देखो मेरी भी बहुत पहले ऐसी ही स्थिति  थी .पर धीरे धीरे मै प्रयोग करता रहा .मुझको बाद में भरोसा हो गया क्योंकि चीजें मेरे साथ ही घटित होने लगी .तब फिर अविश्वास करने का प्रश्न ही नहीं रहा .यह गुरु की कृपा थी और ऐसा मेरे प्रारब्ध था .अभी तुम ऐसे हो पर बाद  में तुम्हारा परिवर्तन होगा और क्या पता की बाद में तेरे ही चेले तुझ पर ही शक करें "
गुरुदेव ने बोला .सब हसने लगे .
बाद में  अगले दिन रितेश भी परमात्मा और अस्तित्व की सदभावना पर शक करके निराशा भरी बातें करने लगा तो मुझे गुरुदेव की बात याद आई की अभी इसके प्रारब्ध में अभी ऐसे ही असंतोष में जीना है .अभी यही है .बाद में आगे समय के अनुसार परिवर्तन होगा .
घुमा फिर के सारी बात एक ही शब्द में अटक जाती है की अभी ऐसा प्रारब्ध है .आप चाहो या ना चाहो वैसा घटित  होना ही परमात्मा की मर्जी है .इसी को एक शब्द में प्रारब्ध कहते है .

1 टिप्पणी:

  1. आईये जाने .... प्रतिभाएं ही ईश्वर हैं !

    आचार्य जी

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