24 मई 2010

शक्ति सक्रिय और स्त्रैन्य है.

जगत  में सर्वत्र उर्जा या कह लीजिये शक्ति ही  है .

Einstein के e=mcc  के सिद्धांत  ने यह साबित कर दिया है .

हिन्दू मान्यता भी जगत को ब्रम्ह या शक्ति मानती है .

ब्रम्ह स्वयं में निष्क्रिय है उसकी सक्रियता शक्ति के कारण है  संसार शक्ति विश्व रूप में शक्ति है.

(Power as universe is called Samsara.)

 यही शक्ति व्यक्ति के अंदर अभिवयक्त  हो तो वही निर्वाण है .








तब संसार का स्वानुभव क्या है ?

यह जो  जीवन का स्वाभाविक प्रवाह है वह धर्म है  .

धर्म की खासियत है कर्तव्य और व्यक्ति की सीमायें .

(The world  is the world of form, and Dharma is the Law of Form. Form necessarily implies duality and limitation. Therefore, experience in Samsara is an experience of form by form.)


संसार के स्वानुभव का मतलब है शक्ति एक स्वरुप का दुसरे स्वरुप का अनुभव .

यही निर्वाण है यही मोक्ष है .

 द्वैत का भाव यही है .यह सीमित है और सापेक्ष है.

 विश्व की पूर्ण शक्ति को शिव -शक्ति कहा गया है .यह सर्वोच्च है .

  शिव शक्ति एक ही सत्ता के दो पहलु है .शिव निष्क्रिय है ,पुरुष है  और शक्ति सक्रिय  और स्त्रैन्य  है.

इसी शक्ति को महामाया भगवती माँ  के रूप में  शाक्त भक्त  पूजा करते है .

माँ के इस रूप को बौद्दिक तल पर जानना यह भक्त नहीं चाहता .
भक्त माँ के स्वरुप को चिन्मय चेतना के रूप में अनुभूत करना चाहता है .

1 टिप्पणी:

  1. माँ के इस रूप को बौद्दिक तल पर जानना यह भक्त नहीं चाहता .
    भक्त माँ के स्वरुप को चिन्मय चेतना के रूप में अनुभूत करना चाहता है...absolute truth.

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