22 मई 2010

कर्म और भाग्य का रहस्य

आज सत्संग में तीन चार लोग ही बैठे है .गुरुदेव के आने पर सभी ने गुरुदेव को प्रणाम किया .ध्यान केंद्र बूढ़ापारा रायपुर में गुरुदेव की निवास की दूसरी मंजिल पर है .
अभी यहाँ दूसरा कूलर लगने से गर्मी कम लग रही है .गुरुदेव प्रसन्न है की कूलर लगा है ."तुम लोग यंग हो ,अब ध्यान केंद्र में जो भी करना है तुम लोगों को करना है .मै अब उतना भाग दौड़ नहीं कर सकता .कूलर जो लगाय हो ये बहुत अच्छा हुआ .गर्मी में मुझको बहुत तकलीफ होती थी .यहाँ तुम लोग जब से तंत्र कर रहे हो यहाँ की एनेर्जी के अलावा यहाँ की भौतिक समृद्धि भी बढ रही है .मुझे यह देख  कर प्रसन्नता होती है .भगवान् श्री ओशो  और अन्य सुक्ष्म शरीर में यहाँ आने वाली सत्ताएँ यह देखकर तुम
लोगों को और भी आशीष देती है ."

(यहाँ 1979 से गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी (श्री रजत बोस )जी के संचालन में नीरव रजनीश ध्यान केंद्र के नाम से सत्संग ध्यान इत्यादि क्रियाकलाप चल रहे है .)

"स्वामी जी ,यहाँ हम लोग मन्त्र जाप करते है ,यज्ञ हवन ,पूजा करते है ,ज्योतिषी उपचार करते है इससे हमारे जीवन में भौतिक और आत्मिक लाभ हुआ है .यहाँ आने वाले सभी को लाभ हुआ है .ये सब उपाय भाग्यवादी है या कर्म वादी ?ये सब भाग्य के अनुसार होता है तो कर्म का क्या महत्व है ?  मुझे इस विषय में हमेशा शंका रहती है ." मैंने पुछा .

"बढ़िया प्रश्न पुछा है तुमने .जयादातर लोगों को बड़ा भ्रम है इस विषय पर "

"तुम तो ज्योतिष जानते हो .यह तो तुमको दिख ही गया होगा की जीवन में सारा कुछ प्रारब्ध के अनुसार ही होता है .यह प्रारब्ध पूर्व जन्मो के कर्म के हिसाब से तय होता है .इसी प्रारब्ध के अनुसार ही व्यक्ति कर्म करता है .यानि कर्म का निर्धारण प्रारब्ध के अनुसार होता है अगर अच्छा प्रारब्ध है की बहुत सफल होगा तो कर्म भी उसी अनुसार सफलता प्राप्ति के अनुकूल व्यक्ति करता है . "

 मैंने फिर पुछा "अगर ऐसा है तो वर्तमान में हमको कर्म करने की कोई स्वतंत्रता नहीं है ?"

"देखो  70  प्रतिशत कर्म तो प्रारब्ध के हिसाब से तय है की तुम क्या करोगे .तुमको जो स्वंत्रता मिली है वर्तमान में कर्म करने की वो संचित कर्म कहलाता है . वो स्वतंत्रता तुमको है .इसी के हिसाब से तुम्हारा भविष्य निर्धरित होगा .इसीलिए कहते है की वर्तमान में शुभ कर्म करो .यह शुभ कर्म तुमको अभी तो लाभ देगा ही और भविष्य का भी प्रारब्ध शुभ बनाएगा .इसी कारण से मन्त्र ,रत्न ,यज्ञ हवन ,पूजा आपको जायदा लाभ देते दिखते है क्योंकि इससे तुहारा प्रारब्ध ,वर्तमान और संचित कर्म सभी सुधरता है .तुमको समझ आया .यही कर्म,प्रारब्ध ,संचित कर्म का रहस्य है जिसे   ज्यादातर लोग समझ नहीं पातें है ." गुरुदेव ने कहा .

"जी ,स्वामी जी" मैंने  संतुष्ट होकर कहा .

"स्वामीजी मुझको तो  क्लिष्ट शब्दों के कारण कुछ पल्ले नहीं पड़ा " पिंकू ने कहा .

 सभी लोग हंस दिए.

स्वामी जी ने मुस्कुराते हुवे कहा " सब कुछ भाग्य ही है .जो भी कर्म लोग कर रहे है वो भाग्य ही उनसे ऐसा कर्म करा रहा है .अच्छा भाग्य वाले को अच्छा कर्म और बुरा भाग्य वाले को बुरा कर्म ."

"कर्म तो सभी व्यक्ति बराबर ही करते है .कर्म कोई जादा  या कम नहीं करता है .फल में अंतर भाग्य के कारण है "

"इसलिए आप कर्म जादा कर लूँगा तो जादा लाभ मिलेगा ऐसा नहीं होता .भाग्य में होगा तो कर्म वो जादा करा लेगा ."

"इसलिए आप जानों की कर्म में उंच नीच नहीं कर सकते .उसके बदले आप रत्न मन्त्र पूजा यज्ञ हवन करके भाग्य कम  लो तो जादा लाभ होगा."

यही कर्म और भाग्य का रहस्य है .

//जय गुरुदेव,जय भैरवी माँ  //

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