2 अप्रैल 2010

भगवान् श्री रजनीश (ओशो ) का निमंत्रण और रजत बोस जी का संन्यास


मेरे गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी जी का अपने गुरु भगवान् श्री रजनीश (ओशो ) से 1979 से 1987 के बीच जीवंत गुरु शिष्य संपर्क रहा था . इस जीवंत भावपूर्ण और भक्ति आशीष से भरे सम्बन्ध के प्रमाण है उनके बीच के पत्र संवाद .
भगवान् श्री रजनीश के पत्रों की विशिष्टता शैली और महत्ता अपने आप में एक मिशाल है .
प्रेमी मित्रों  को मै अपने गुरु स्वामी चिन्मय योगी जी को भगवान् श्री रजनीश के द्वारा भेजे गए प्रेम सन्देश के जाग्रत जीवंत अंश  पोस्ट लिख रहा हूँ .
शुरूवात का आमंत्रण 
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प्रिय बोस जी                                १०-४-७८
              प्रेम 
आपका भावभरा पत्र मिला . धन्यवाद .
भगवान् श्री के उपलब्ध साहित्य का सूची पत्र भेजा जा रहा है . 
आप जो पुस्तकें मँगाना चाहे ,सूचित करें .
                                 प्रभु श्री के आशीष 
                                   माँ योग लक्ष्मी
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प्रिय मित्र                                    १७-११-७८
            प्रेम
आपका भाव भरा पूर्ण पत्र मिला .
आप यहाँ शिविर में आयें .शिविर की सूचना सलंग्न है .
और अब संन्यास में छलांग लेने की तैयारी करे .
आपका रुपये २४ का M.O. संन्यास पत्रिका हेतु मिल गया है
                                प्रभु श्री के आशीष
                                   माँ योग लक्ष्मी
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हमारे गुरु देव रजत बोस जी भगवान् श्री के कुछ प्रयोग कर रहे थे घर में पर संन्यास और वो भी रजनीश का 1978 में .आप सोचते रहे
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प्रिय मित्र                                २४-१२-७८
           प्रेम
आपका M.O. व पत्र मिले .
पत्रिकाएँ आपको भेजी जा चुकी है 
संन्यास हिंदी का नव. दिस. अंक भी सभी सदस्यों को पिछले सप्ताह  भेज दिया गया है .
1979  की डायरी (अंग्रेजी में ) में भगवान् की जीवनी संक्षेप ने छपी है तथा आश्रम कम्यून आदि की भी सूचना छपी है .आप चाहें तो मंगा सकते है .मूल्य है रुपये 75.00 .
"अभी परमात्मा उपलब्ध है ,देरी करना ठीक नहीं ."

यदि भाव हो तो अभी -२ शिविर में आयें .
                                   प्रभु श्री के आशीष 
                                         माँ योग लक्ष्मी
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रजनीश जी के ओर से इस प्रकार का आमंत्रण दुर्लभ है .गुरुदेव रजत बोस जी सोचते रहे
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प्रिय रजत जी                                    4-1-79
               प्रेम.
आपका पत्र मिला .
आपका भाव स्वाभाविक है .
अगर भगवान् के भारत छोड़ने का इशारा दुखदायी है तो मित्रों  के  साथ मिलकर सरकार को अपील अपनी ओर से करें .
जानकारी के लिए Press Release भेज रहे है .
"और अच्छा होगा अब आप यहाँ आयें" .
"संन्यास की तैयारी भी करें ".
"सोचते सोचते तो आदमी जीवन को चुक जाता है"
                                     प्रभु श्री के आशीष 
                                         माँ योग लक्ष्मी 
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इतना जब गुरु ने सन्देश भिजवाया तब कंही जाकर हमारे गुरुदेव श्री रजत बोस जी पूना आश्रम जा कर १३ जनवरी १९७९ को संन्यास भगवान् श्री से लिया . ओशो ने उन्हें संन्यास नाम स्वामी चिन्मय योगी दिया . इस के बारे में गुरु देव कहते है
"भगवान श्री का स्पर्श मेरे जीवन के रूपांतरण की सबसे बड़ी घटना है "
"गुरु से सन्यस्त होना नए जीवन में प्रवेश है  यही है द्विज होना "

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