27 मार्च 2010

ओशो को पढ़ना और ओशो को जीना

भगवान श्री रजनीश (ओशो) की किताबों में गजब का सन्मोहन है .उनकी बातों में जो दम है वो सारी दुनियां के किसी भी संत या  साहित्यकार में नहीं है .लेकिन जैसे हवाई जहाज की  बातों को किताब में पढना और सिर्फ पढ़ कर बातें  करना जहाज में उड़ने से बिलकुल अलग है वैसे ही किताबी  बातें धर्म और अध्यात्म के बारे में  है .ओशो की किताबों को पढ़ कर उलझन में जब  काफी समय मैंने  निकल दिया तब ओशो पढना शुरू करके  लगभग ७ से ८ साल बाद १९९९ में मेरी गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी जी से मुलाकात हुई .

गुरुदेव ओशो के प्रेम में डुबे हुए थे .उनका ओशो के सारे साहित्य में जबरदस्त पकड़ थी .वो गृहस्थ थे और अपना ध्यान केंद्र अपने घर में चलाते थे.

 ओशो ने अपने "बिरहनी मंदिर दियना बार" प्रवचन श्रृंखला में १४,१६ १८ जनवरी १९७९ को तीन दिन उनके तीन प्रश्नों के उत्तर   दिए है जो उनकी पुस्तक में आज भी छप रहें है. ओशो से उनकी व्यक्तिगत बातें हुई है और उन्होंने ओशो से स्वयं सन्यास लिया है .ओशो के अलावा तत्कालीन ओशो आश्रम के प्रमुख सन्यासी स्वामी आनंद मैत्रेय जी से भी उनकी गाढ़ी घनिष्ठता थी .गुरुदेव और ओशो के बीच ,और गुरुदेव और मैत्रेय जी के बीच के पत्रव्यवहार   को देखने से उनके बीच के प्रेम और एकात्मता का पता चलता है .

ओशो बोलते थे की मेरे प्रवचनों को मत देखो मै क्या हूँ यह देखो.
गुरुदेव ने कहा" मनुष्य शरीर में मुझे  ओशो  साक्षात् भगवान्  ही लगते थे .उनके संग साथ मुझको भगवान् का संग साथ लगता था ."
"मेरा उनसे सम्बन्ध निकटतम प्रेमी के जैसे हो गया था ."
"मेरा सारा जीवन और अस्तित्व उनके आशीष से ओतप्रोत है "
" आज भी मै उनको वैसे ही नजदीक पता हूँ "
गुरुदेव ने कहा " मुझको  ओशो ने स्वयं ही प्रवचनों के जाल से मुक्ति दिलाई और मुक्त कर दिया .ओशो को पढ़ना तो सिर्फ किताबी बातें है पर ओशो को जीना अलग ही है. तुम लोग जो भक्ति प्रेम और साधना की आश्रम जीवन को अपने घर गृहस्थी ,कामकाज के साथ जी रहे हो वही आनंदपूर्वक जीना ही ओशो को जीना है और मृत्युपरांत ये आश्रम का संग साथ ये आनंद चिरकाल तक रहेगा .यह ओशो का ही आशीर्वाद है जो मुझको मिला है और यह सिलसिला तुम  तक आया है  और आगे भी चलता रहेगा.
धर्म इसीलिए शाश्वत है . 

2 टिप्‍पणियां:

  1. आप सही कह रहे है......
    .
    धर्म के जानकार लोगों से माफी सहित ....
    धर्म के बारे में लिखने ..एवं ..टिप्पणी करने बाले.. तोता-रटंत.. के बारे में यह पोस्ट ....मेरा कॉमन कमेन्ट है....
    http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_27.html

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  2. ओशो खुद कहते थे कि मेरा इस्तेमाल करो और मुझे छोड़ दो और मुक्त हो जाओ.... "

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