26 मार्च 2010

श्री गुरु चरण सरोज रज

श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि ।
बरनउं रघुबर विमल जसु, जो दायकु पल चारि ।।
बुद्घिहीन तनु जानिकै, सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुद्घि विघा देहु मोहि, हरहु कलेश विकार ।।

श्री जे पी मिश्रा जी रिटायर्ड इंजिनियर है और वर्तमान में रायपुर में एक  कंपनी में सलाहकार है . आध्यात्म और साधना में उनका काफी ज्ञान है और उनकी अपने गुरु श्री राम  शर्मा जी के प्रति उनकी भक्ति देख  कर मेरी उनसे आत्मीयता हो गई . एक दिन गाड़ी में कंपनी जाते हुए गुरु के आशीष की चर्चा हुई तो उन्होंने तुलसी दास जी के हनुमान चालीसा की यह चौपाई गाई-

श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि ।
बरनउं रघुबर विमल जसु, जो दायकु पल चारि ।।
बुद्घिहीन तनु जानिकै, सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुद्घि विघा देहु मोहि, हरहु कलेश विकार ।।

उन्होंने कहा " सारी आध्यत्मियता का सार तुलसीदास जी ने इन चार लाइनों में बताया है .गुरुदेव के चरण की धुल मात्र को अपने मन में धारण करने से मन का सुधार हो जाता है . "
" मन का सुधार ही तो सबसे बड़ी बात है ,और इसका सुधार गुरु के चरणों की भक्ति से ही हो सकता है .इसके आगे क्या करना है इसे भी तुलसी बाबा ने बताया है  ऐसे सुधरे हुए मन से श्री राम भगवान की पवित्र गुणों का चिंतन करना है . इससे  धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष की प्राप्ति होती है ."
"आगे तुलसी बाबा ने भक्त की बात कहते हुए कहा है की अपने को बुद्धिहीन मान  कर के ही आप हनुमानजी को याद करिए .उनसे प्रार्थना करिए की आप मेरे संकट को दूर करके मुझको बल ,बुद्धि ,विद्या का आशीष दीजिये .
भक्त की इस स्थिति को व्यक्ति गुरु की कृपा से ही उपलब्ध हो सकता है "
गुरु की याद करके मिश्रा जी भाव से भर उठे. आँखों से अश्रु धारा निकल आई .
मिश्रा जी ने जोर दे कर कहा " अरे भाई यही तो समझना है की जीवन कर्म साध्य नहीं है ,जीवन कृपा साध्य है"

1 टिप्पणी:

  1. जीवन कर्म साध्य नहीं है ,जीवन कृपा साध्य है

    -सत्य वचन!!

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