31 मार्च 2010

सहज भक्ति का निश्चल आनंद

परमात्मा, ईश्वर,देवी देवता ,गुरु के सामने व्यक्ति की कोई बखत नहीं है .

ये एक ऐसी प्रतीति है जो महसूस करने वाले को सामान्य जीवन और तमाम प्रगतिशीलता के आयाम से आध्यत्मिक आयाम की ओर ले जाती है

.क्या खास है इस प्रतीति में ?


जब व्यक्ति के सारे प्रयास असफल हो जाते है और उसे निराशा घेर लेती है तब उसको इस परिस्थिति इस उबरने वाले के सामने नतमस्तक हो जाने के अलावा और कोई उपाय नहीं रहता .

इसी को दैवीय शक्तियों का प्रभाव बोलते है .

इस असर का आनंद भक्ति से भरकर ही लिया जा सकता है .

अहंकार की भक्तिभाव में कोई जगह नहीं है और कृतघ्न भी भक्त नहीं है

30 मार्च 2010

Hidden Machanism of nine planet


Astrology means JYOTISH =KNOWLEDGE OF LIGHT TO THE LIFE .


Astrology clearly  indicates that one can excercise his choices and if one can understand the role of all the nine planets then choices can be utilised to maximum.

Astrology says that man has to use his mindpower before an action.If an action has taken place or for example if cricket bol has been delivered than all the pattern of shot and runs which is destiny cannot be avoided.
Mind is the originator of all problems and real force which can librate the man from all the bad karma and future.The requiment is to understand the the hidden force of the mind and its machanism .There are plenty of methods for it like yoga ,meditition ,mantra ,tantra, etc..

In astrology ,certain rules have been laid down by the sages and these suggests that person do certain things to overcome the bondage of all his past and future karma.The mind is the source of all the creation and if the human beings mind is in accordence with the mind of nature ,then a man can be free from allkinds of result.

Once this phenomeneon is understood  correctly, then the consequences af all the action can be felt happily .Today morden managment guru are working the same with  diifferent stroke.
"असतो म़ा ज्योतिर्गमय "

29 मार्च 2010

प्रार्थना से आप बदलते हो, परमात्मा नहीं



"स्वामी जी जन्म पत्रिका देख कर, जब किसी का उपचार तंत्र मंत्र और रत्न से करता हूँ तो क्या इससे जीवन की सारी  समस्या का समाधान हो जायेगा ?"मैंने गुरुदेव से पुछा .
"सारी समस्या तो ठीक नहीं हो सकती, नहीं तो पत्रिका ही गलत साबित हो जाएगी .हाँ आप उसको उसकी समस्या से राहत जरुर दिलवा सकते हो ."गुरुदेव ने कहा .
"राहत  किस प्रकार से मिल सकती है ?"
" जैसे कोई समस्या आने वाली है तो उसकी तीव्रता कम हो जाएगी .अगर लाभ मिलने वाला है तो लाभ ज्यादा मिलेगा  "
"लेकिन क्या समस्या पूरी तरह से नहीं आये ऐसा नहीं हो सकता "
गुरुदेव मुस्कुरा कर बोले " बेटा ,प्रारब्ध के लिखे को तो विधाता भी नहीं बदल सकता है . मंत्र ,रत्न ,तप, पूजा ,प्रार्थना ,से जो असर आता है उस कारण व्यक्ति  में परिवर्तन आता है जो उर्जा के तल पर होता है .इसी फर्क के कारण फल प्राप्ति में बदलाव आ जाता है "थोडा सा ही फर्क आता है तो फिर पता क्या चलेगा ?"
गुरुदेव ने कहा "इसे ऐसे समझो की अगर फ़ाइनल मैच में भारत की टीम को जीतने के लिए ३५० रनों की जरुरत है और अंतिम ओवर में उसे जीतने के लिए १२ रनों में भाग्य से ३ रन मिल जाते है और टीम जीत जाती है  तो कितना फर्क पड़ जाता है .पुरे ३४७ रन टीम ने अथक परिश्रम से बनाये और उतने बनाने  ही  पड़ेंगें ,तभी ३ रन भाग्य वाले जीत के लिए काम आएंगे .अब तुम बताओ की थोडा सा ही फर्क रिजल्ट में कितना फर्क कर देता है और इसी प्रकार जीवन में भी भाग्य के थोड़े से फर्क से आप सोच नहीं सकते उतना सकारत्मक फर्क पड़ जाता है ."
"ये तो वाकई में काफी बड़ा अंतर आ गया " मैंने खुश होकर कहा .
" आप  लगातार मंत्रजाप प्रार्थना इत्यादि करते हो तो सबसे पहले आपकी कई समस्या जो आने वाली रहती है वो कट जाती है जिनका की आपको कभी आभास ही नहीं होता .तुम लोगों की उम्र अभी कम है .मैंने जीवन में इतने कष्ट झेले है तो अनुभव से ही बता देता हूँ की तुमको और भी कष्ट आयेंगे इसलिए अगर तुम प्रभु के शरण में रहोगे तो ही कष्टों को आसानी से प्रभुकृपा ,साईकृपा से पार कर जाओगे .मुझे शुरुवात में  कर्म का ही सहारा दिखता था पर जब मात्र कर्म से ही काम नहीं बना और गुरुकृपा ,साईं कृपा  से काम बना तो इनके प्रति मेरी आस्था बढ गई. मेरा रोम रोम इनका आभारी हो कर इनके प्रेम और आस्था में पड़ गया ."
"गुरुदेव अगर मै करूंगा तो मुझ पर भी साईं कृपा करंगे ?"  मैंने पुछा.
" बेटा उनका आशीष तो प्रतिपल बरस ही रहा है .आप प्रार्थना मन्त्र पूजा से गुरु साईं भगवान् को नहीं बदलते हो बल्कि आप उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए अपनी झोली आगे करते हो .तुम करोगे तो तुमको अवश्य ही कृपा प्राप्ति होगी ."
"मुझको कितनी जल्दी यह पता चलेगा की कृपा हो रही है ?"
"बेटा,इसमें देरी और जल्दी का नहीं है यह भीतर की आस्था की बात है .आस्था होगी तो पता चलेगा ही ." 

28 मार्च 2010

सदगुरु दांव बतईया खेले दास कबीर "

मेरे गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी जी ने अपने गुरु भगवान श्री रजनीश ओशो से पुछा "भगवान् ,किसी व्यक्ति को सदगुरु मिल गया. सदगुरु ने पूजा ध्यान विधि बता दी .उसके बाद क्या  सदगुरु  की आवश्यकता नहीं है ?"
भगवान् श्री ने कहा "भले ध्यान पूजा की आवश्यकता नहीं हो पर सदगुरु तो परम आवश्यक  है "

देवी देवता तो अदृश्य है पर सदगुरु प्रत्यक्ष है

.मेरे गुरुदेव कहते है की हजार कार्यों से भी महत्वपूर्ण कार्य गुरु का संगसाथ (सत्संग) है.

सदगुरु के लिए कबीर  ने बोला है "बहुरि ना ऐसा दांव "  " सदगुरु दांव बतईया खेले दास कबीर "

चिन्मय योगी परा वेदा चिन्मय योगी परा मखा
चिन्मय योगी परा योगा  चिन्मय योगी परा क्रिया
चिन्मय योगी परम ज्ञानं चिन्मय योगी परम तपः
चिन्मय योगी परा भक्तिम चिन्मय योगी परम गतिम्

27 मार्च 2010

ओशो को पढ़ना और ओशो को जीना

भगवान श्री रजनीश (ओशो) की किताबों में गजब का सन्मोहन है .उनकी बातों में जो दम है वो सारी दुनियां के किसी भी संत या  साहित्यकार में नहीं है .लेकिन जैसे हवाई जहाज की  बातों को किताब में पढना और सिर्फ पढ़ कर बातें  करना जहाज में उड़ने से बिलकुल अलग है वैसे ही किताबी  बातें धर्म और अध्यात्म के बारे में  है .ओशो की किताबों को पढ़ कर उलझन में जब  काफी समय मैंने  निकल दिया तब ओशो पढना शुरू करके  लगभग ७ से ८ साल बाद १९९९ में मेरी गुरुदेव स्वामी चिन्मय योगी जी से मुलाकात हुई .

गुरुदेव ओशो के प्रेम में डुबे हुए थे .उनका ओशो के सारे साहित्य में जबरदस्त पकड़ थी .वो गृहस्थ थे और अपना ध्यान केंद्र अपने घर में चलाते थे.

 ओशो ने अपने "बिरहनी मंदिर दियना बार" प्रवचन श्रृंखला में १४,१६ १८ जनवरी १९७९ को तीन दिन उनके तीन प्रश्नों के उत्तर   दिए है जो उनकी पुस्तक में आज भी छप रहें है. ओशो से उनकी व्यक्तिगत बातें हुई है और उन्होंने ओशो से स्वयं सन्यास लिया है .ओशो के अलावा तत्कालीन ओशो आश्रम के प्रमुख सन्यासी स्वामी आनंद मैत्रेय जी से भी उनकी गाढ़ी घनिष्ठता थी .गुरुदेव और ओशो के बीच ,और गुरुदेव और मैत्रेय जी के बीच के पत्रव्यवहार   को देखने से उनके बीच के प्रेम और एकात्मता का पता चलता है .

ओशो बोलते थे की मेरे प्रवचनों को मत देखो मै क्या हूँ यह देखो.
गुरुदेव ने कहा" मनुष्य शरीर में मुझे  ओशो  साक्षात् भगवान्  ही लगते थे .उनके संग साथ मुझको भगवान् का संग साथ लगता था ."
"मेरा उनसे सम्बन्ध निकटतम प्रेमी के जैसे हो गया था ."
"मेरा सारा जीवन और अस्तित्व उनके आशीष से ओतप्रोत है "
" आज भी मै उनको वैसे ही नजदीक पता हूँ "
गुरुदेव ने कहा " मुझको  ओशो ने स्वयं ही प्रवचनों के जाल से मुक्ति दिलाई और मुक्त कर दिया .ओशो को पढ़ना तो सिर्फ किताबी बातें है पर ओशो को जीना अलग ही है. तुम लोग जो भक्ति प्रेम और साधना की आश्रम जीवन को अपने घर गृहस्थी ,कामकाज के साथ जी रहे हो वही आनंदपूर्वक जीना ही ओशो को जीना है और मृत्युपरांत ये आश्रम का संग साथ ये आनंद चिरकाल तक रहेगा .यह ओशो का ही आशीर्वाद है जो मुझको मिला है और यह सिलसिला तुम  तक आया है  और आगे भी चलता रहेगा.
धर्म इसीलिए शाश्वत है . 

26 मार्च 2010

श्री गुरु चरण सरोज रज

श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि ।
बरनउं रघुबर विमल जसु, जो दायकु पल चारि ।।
बुद्घिहीन तनु जानिकै, सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुद्घि विघा देहु मोहि, हरहु कलेश विकार ।।

श्री जे पी मिश्रा जी रिटायर्ड इंजिनियर है और वर्तमान में रायपुर में एक  कंपनी में सलाहकार है . आध्यात्म और साधना में उनका काफी ज्ञान है और उनकी अपने गुरु श्री राम  शर्मा जी के प्रति उनकी भक्ति देख  कर मेरी उनसे आत्मीयता हो गई . एक दिन गाड़ी में कंपनी जाते हुए गुरु के आशीष की चर्चा हुई तो उन्होंने तुलसी दास जी के हनुमान चालीसा की यह चौपाई गाई-

श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि ।
बरनउं रघुबर विमल जसु, जो दायकु पल चारि ।।
बुद्घिहीन तनु जानिकै, सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुद्घि विघा देहु मोहि, हरहु कलेश विकार ।।

उन्होंने कहा " सारी आध्यत्मियता का सार तुलसीदास जी ने इन चार लाइनों में बताया है .गुरुदेव के चरण की धुल मात्र को अपने मन में धारण करने से मन का सुधार हो जाता है . "
" मन का सुधार ही तो सबसे बड़ी बात है ,और इसका सुधार गुरु के चरणों की भक्ति से ही हो सकता है .इसके आगे क्या करना है इसे भी तुलसी बाबा ने बताया है  ऐसे सुधरे हुए मन से श्री राम भगवान की पवित्र गुणों का चिंतन करना है . इससे  धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष की प्राप्ति होती है ."
"आगे तुलसी बाबा ने भक्त की बात कहते हुए कहा है की अपने को बुद्धिहीन मान  कर के ही आप हनुमानजी को याद करिए .उनसे प्रार्थना करिए की आप मेरे संकट को दूर करके मुझको बल ,बुद्धि ,विद्या का आशीष दीजिये .
भक्त की इस स्थिति को व्यक्ति गुरु की कृपा से ही उपलब्ध हो सकता है "
गुरु की याद करके मिश्रा जी भाव से भर उठे. आँखों से अश्रु धारा निकल आई .
मिश्रा जी ने जोर दे कर कहा " अरे भाई यही तो समझना है की जीवन कर्म साध्य नहीं है ,जीवन कृपा साध्य है"

25 मार्च 2010

नवरात्र साधना गृहस्थ


नवरात्री का समापन हुआ .माता की भक्ति से सारा भारत भावपूर्ण हो उठा है .मेरे सभी मित्रों को रामनवमी की शुभकामनायें .
एक गृहस्थ होने के नाते मै नवरात्र में क्या पूजा करू ? यह प्रश्न मन में उठा तो सभी तंत्र और पूजा के साहित्य को पढ़ कर देखा . उसमे की पूजा और विधि कठिन लगी और कुछ तो बहुत जायदा समय लेने वाली थी .ज्योतिष को और मंत्र के प्रभाव को देख लेने के बाद कुछ ना कुछ करना है नवरात्र में यह सोच लिया था .सभी साहित्य और ज्ञानियों ने नवरात्र की महिमा और इस समय की साधना की विशेषता का उल्लेख किया है .
मेरे माता पिता नवरात्र में मंदिर में ज्योत जला देते है और प्रथम और आठवें दिन दर्शन के लिए मंदिर जाते है .और साथ में अंतिम दिन खीर पूडी का प्रसाद देवी को लगा कर हूम दे कर पूजा करते है .मेरा इस पूजा से और अधिक कुछ करने का मन था .
मन में इसी विचार को ले कर गुरुदेव से पुछा तो उन्होंने कहा " नवरात्र में सबसे बढ़िया साधना है  देवी के मंत्र का  जाप. तुम प्रतिदिन तो मंत्र जाप करते ही हो .साथ में नवरात्र तक चामुंडा मंत्र का एक माला जाप कर लेना और रविवार को हम सब महामाया मंदिर पुरानी बस्ती में दर्शन के लिए जायेंगे .महामाया मंदिर रायपुर में शक्ति पीठ है .मेरे सारी तंत्र की साधना की सिद्धि यही हुई है .यहाँ भैरव और बटुक नाथ भी देवी के साथ विराजित है .बहुत जाग्रत स्थान है यह रायपुर में .मै तो हर नवरात्र में दर्शन करने जाता हूँ "
ये सबसे बढ़िया हुआ .एक माला मैंने करना शुरू कर दिया और महामाया मंदिर में गुरुदेव के साथ दर्शन करने के लिए गया तो आनंद और बढ़ गया . आठवे दिन भट गाँव परसदा ,बिल्हा बिलासपुर के पास गया .वहां उच्च कोटि के साधक श्री एस  के  दीक्षित जी के घर में   प्रधान पूजा और हवन में शामिल हुआ .देवी का प्रसाद प्राप्त किया और दीक्षित जी की विशेष पूजा को देख कर बड़ा आनंद आया . जय माँ महामाया की जय