27 अगस्त 2009

गुरुदेव की जीवनी -2


शरत चंद्र बोस बैल गाड़ी से मध्य भारत के एक कसबे राय गढ़ में जा कर जीविका के लिए प्रयास करने लगे । वो जो भी काम मिलता था कर लेते थे । एक दिन उनको एक ब्रिटिश ठकेदार के घर में जा कर पेपर देना था । उस समय उस ब्रिटिश ऑफिसर ने इंग्लिश में कुछ कहा तो शरत चंद्र ने उसका उत्तर इंग्लिश में दिया । १८८० के दशक में एक भारतीय को इंग्लिश में बात करते देख कर ब्रिटिश ऑफिसर बहुत प्रभावित हुआ । उसने शरत को अपने रेलवे के काम में रख लिया।

शरत चंद्र की लगन, ईमानदारी और प्रतिभा को देख कर ऑफिसर में शरत को बड़े बड़े काम देना चालू कर दिया । जल्दी ही शरत चंद्र पैसेवाले व्यक्ति बन गए ।

आगे चलकर वो रायपुर में बस गए और यही से अपने ठकेदारी का काम करने लगे। शरतचंद्र ने कलकत्ता की एक अच्छे परिवार की कन्या से विवाह किया । उनके ५ पुत्र हुए ।

शरतचंद्र बोस ने आपने व्यवसाय में बहुत नाम और पैसा कमाया । उनकी संपत्ति कलकत्ता ,पुरी और रायपुर में कई जगह हो गई। रायपुर के बुढापारा में घर बनाकर रहने लगे । रायपुर के प्रसिद्ध राजकुमार कॉलेज का निर्माण भी शरतचंद्र के कुशल ठकेदारी में हुआ । द्वितीय विश्व युद्ध के समय में कलकत्ता के विक्टोरिया मेमोरियल के लिया रायपुर के बासिन के मार्बल को टेंडर ले कर सप्लाई किया। रायपुर के नजदीक रायपुर में उन्होंने इत्टा बनाने का पहला भट्टा बनाया।

गुरुदेव की जीवनी -1


कलकत्ता में एक बोस परिवार रहता था । उसमे तीन भाई थे । सबसे छोटे भाई शरत चंद्र बोस स्कूल में थे । बाकि दो भाई अपने अपने काम में लग गए थे । उनके माता पिता का जल्दी ही देहांत हो जाने से परिवार में कमाने खाने के लिए ज्यादा परिश्रम करना पड़ता था । सबसे छोटे शरत पढ़ाई में अच्छे होने पर भी अपनी शरारतों मित्रता में ही रमे रहते थे । अभाव बाद भी उनकी किशोर अवस्था तक अच्छी पढ़ाई हो थी । वो अपना समय नए ज्ञान ,और धार्मिक सत्संग भी लगते थे ।

एक दिन युवा शरत की भाभी से कहासुनी हो गई । भाभी ने उसे नही के लिए उलाहना दे दिया । नाराज़ शरत चन्द्र निर्णय लिया की में कलकत्ता से दूर जा कर अपनी जीविका कमाऊंगा ।

गुरु ने दिया जीवन का समाधान


जब पहले दिन गुरुदेव से मुलाकात हुई तो मेरे मन का सबसे बड़ा प्रश्न था की मेरा कल्याण होगा की नही ? पर मेरे साथ आए हुये मित्र के जल्दीबाजी के कारण मै नही पूछ पाया। मुलाकात ख़त्म होने के बाद जब विदा लेने के लिए प्रणाम किया किया तो गुरुदेव ने स्वयं से ही कहा " आते जाते रहोगे तो हो जाएगा " उसके बाद हम विदा हो गए ।

सारी रात मुझको उनके व्यक्तित्व का आकर्षण खींचता रहा और उनका उत्तर मंत्रमुग्ध करता रहा ।

मुझे मेरे गुरुदेव ने स्वीकार कर लिया ।

मेरे जीवन का वसंत आ गया ।

मेरे खोज का ख़त्म हुई।

इश्क की आगाज़ हुआ ।

मै खींचता चला गया ।

मेरे प्रेमी ने मुझे पहले दिन से ही स्वीकार कर लिया ।

भगवान श्री रजनीश ने प्रवचन में कहा है "जब शिष्य तैयार होता है तो सदगुरु प्रकट हो जाते है "